Friday, July 31, 2015

चलिए प्रेमचंद के गांव लमही

लमही में कथा सम्राट प्रेमचंद के घर के सामने।
जिन्होंने साहित्य को दिशा दी, दलितों को आकाश। जिन्होंने लेखन को शैली दी, विचार को धाराएं। जिन्होंने हर वर्ग के लिए कलम चलाई और जो 'मानसरोवरÓ के सात भागों में छपीं। जिन्होंने 'हंसÓ को उड़ान दी, भाषा को नवजीवन। जिन्होंने दरिया ए गंगा के किनारे हिलाल की शक्ल में आबाद काशी को दिलफरेब वाला मंजर बताया। उन्हीं प्रेमचंद का गांव है लमही। आपके मन में भाषा की सहजता, साहित्य के उदात्म चरित्र के प्रति सामान्य जज्बा भी जीवित होगा तो इस गांव की मिट्टी को चंदन समझकर माथे से लगा लेंगे। रोज नहीं तो 31 जुलाई (जयंती) और 8 अक्टूबर (पुण्यतिथि) को तो अवश्य ही। अफसोस! यहां इन अवसरों पर जाने के लिए आपको बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। आइए, आपको साहित्य के इस महान तीर्थ लमही तक लें चलें।
लमही में कथा सम्राट प्रेमचंद के स्मारक के पीछे।
अगर आप उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से या बिहार की राजधानी पटना से आना चाहते हैं तो आपको ट्रेन या बस से आना होगा वाराणसी स्टेशन या कैंट रोडवेज। यहां से महज आठ किलोमीटर पर है लमही। यात्रा टुकड़ों में होगी। नहीं मिलेगी कोई सीधी सवारी, चमचमाती सड़क। एक आटो से पहले जाना होगा पांडेयपुर चौराहा, फिर दूसरे से पहुंचिएगा लमही। सीधे जाना चाहते हैं तो पूरा आटो करना होगा। फिर शुरू होगा सफर। सफर कि ईश्वर याद आ जाएं।
पांडेयपुर चौराहे तक तो जाम के झाम में उफ-आह कर पहुंच जाएंगे। इसके बाद लगेगा ही नहीं कि किसी शहर की सड़क पर स्वच्छ वातावरण में किसी साहित्यकार की धरती तक जाने के रास्तेे पर हैं। सड़कों के बड़े-बड़े गड्ढे और उन पर छाए धूल के गुबार से बच गए तो कुछ दूर सड़क के दोनों किनारे आपको जीर्ण-शीर्ण और उजड़े चमन का नजारा 'विकासÓ की पटकथा लिखता नजर आएगा। इस दौरान भूल से भी किसी ऐसे शिलापट्ट की कल्पना मत कीजिएगा, जिस पर यह लिखा मिले कि रास्ता महान कलमकार के गांव तक जाता है। पांडेयपुर चौराहे पर लगी है प्रेमचंद की मूर्ति। ताज्जुब हुआ कि मूर्ति भी आने वालों को नहीं दिखती। एक तो यह पता ही नहीं चलता कि ओवरब्रिज के नीचे जाम के झाम में गोल घेरा है क्या। दूसरे मूर्ति उस पार लगी है और लमही से लौटने वालों को ही दिखती है।
इतिहास को खंगालने वाले जानते हैं कि साहित्य सृजन के प्रति प्रेमचंद का लगाव कितना गहरा था। समय- काल और परिस्थितियों से उनकी कलम सीधी टक्कर लेती थी। जिस चरित्र को उन्होंने बरसों पहले कथाओं में सहेजा, वे आज भी घूमते नजर आते हैं। 'सोजे वतनÓ देश प्रेम के प्रति जज्बा जगाने वाली उनकी वह कृति थी, जिसे ठीक उसी तरह प्रतिबंधित किया गया, जैसे आजादी के दीवानों को फांसी पर चढ़ा दिया जाता था। प्रेमचंद की धर्मपत्नी शिवरानी देवी ने 'प्रेमचंद घर मेंÓ में कथा सम्राट से संबंधित जिन घरेलू बातों की चर्चा की है, उनमें हंस का प्रकाशन होता रहे, इसके प्रति उनकी समर्पण भावना का अनूठा चरित्र सामने आता है।
घटनाएं बानगी हैं। प्रेमचंद का पोर-पोर देश प्रेम, समाज के उत्थान और साहित्य सृजन से जुड़ा है। किसी बच्चे से किसी साहित्यकार का नाम पूछ लीजिए, उसकी जुबान पर सबसे पहले आता है प्रेमचंद। उनके साहित्य और सृजनशीलता का आनंद लेने वालों का भी पोर-पोर इनका ऋणी होना चाहिए। और कुछ नहीं तो इतना तो होना ही चाहिए कि वाराणसी और यहां तक आने सभी स्टेशनों-बस अड्डों पर लिखा मिले कि यहां से उतरकर आप प्रेमचंद की मिट्टी को प्रणाम करने जा सकते हैं। मान लेते हैं कि किन्हीं कारणों से इन स्थानों पर सूचना पट्ट नजर नहीं आते, लेकिन वाराणसी में तो यह नजर आना ही चाहिए था। आप स्टेशन या रोडवेज से लमही की ओर जाते रास्तेे में इस सूचना को तलाशेंगे तो आंखें तरसती रहेंगी।
और हां, इस रास्ते पर बढ़ते सीधा मत देखते चलिए। लमही छूट जाएगी, आप आगे निकल जाएंगे। मुख्य सड़क से जो रास्ता फूटा है, उस ओर ही लमही का संकेत मिलेगा। बहरहाल, इन सब बातों से हमारे-आपके ऊपर तो फर्क पड़ता है, लमही पर नहीं। यह मिट्टी तो साहित्य का चंदन है। इसे माथे पर लगाइए।
(दैनिक जागरण के वाराणसी संस्करण में ३१ जुलाई को पेज वन पर प्रकाशित)

...तो प्रेमचंद से ऐसे जुड़ गया 'मुंशी'
प्रेमचंद अध्यापक रहे, कायस्थ भी थे। तब अध्यापकों को मुंशी जी कहा जाता था, कायस्थों के नाम के पहले भी सम्मान स्वरूप मुंशी लगाने की परंपरा रही है। लोगों को लगता है, इसीलिए प्रेमचंद हो गए मुंशी प्रेमचंद। लेकिन, यह पूरा सच नहीं है।
प्रेमचंद के सुपुत्र एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार अमृत राय ने एक पत्र में उल्लेख किया है, प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे मुंशी शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। हालांकि, उनका यह भी मानना है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है, जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने कभी लगा दिया होगा।
इस संबंध में प्रेमचंद की धर्मपत्नी शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक 'प्रेमचंद घर मेंÓ में प्रेमचंद से संबंधित सभी घरेलू बातों की चर्चा की है, पर कहीं भी उनके लिए मुंशी का प्रयोग नहीं हुआ है। हालांकि, शिवरानी देवी ने इसी पुस्तक में दया नारायण जी के लिए मुंशी जी शब्द का प्रयोग कई बार किया है।
प्रेमचंद के नाम, जो प्रकाशकों ने उनकी कृतियों पर छापे हैं, उनमें क्रमश: श्री प्रेमचंद जी (मानसरोवर प्रथम भाग), श्रीयुत प्रेमचंद (सप्त सरोज), उपन्यास सम्राट प्रेमचंद धनपतराय (शिलालेख), प्रेमचंद (रंगभूमि), श्रीमान प्रेमचंद जी (निर्मला) आदि कृतियों पर भी कहीं भी मुंशी का प्रयोग नहीं हुआ है।
तो कैसे जुड़ा प्रेमचंद के नाम के साथ मुंशी विशेषण? एकमात्र कारण जो दिखता है, वह यही है कि हंस नामक पत्र प्रेमचंद एवं कन्हैयालाल मुंशी के सह संपादन मे निकलता था। इसकी कुछ प्रतियों पर कन्हैयालाल मुंशी का पूरा नाम न छपकर मात्र मुंशी छपा रहता था, साथ ही प्रेमचंद का नाम इस प्रकार छपा होता था -  
संपादक
मुंशी, प्रेमचंद।
समझा जाता है कालांतर में पाठकों ने मुंशी तथा प्रेमचंद को एक समझ लिया और प्रेमचंद, मुंशी प्रेमचंद बन गए। अब तो प्रेमचंद के साथ मुंशी शब्द इतना गहरा जुड़ गया है कि सिर्फ मुंशी से ही प्रेमचंद का बोध हो जाता है। यह सहज भी लगता है। प्रेमचंद का शिक्षक व कायस्थ होना बाद में उनके नाम के आगे के मुंशी को मजबूत करता चला गया...।

Sunday, March 1, 2015

Dr.Mamta Sharan: साल भर के महत्वपूर्ण दिवस

Dr.Mamta Sharan: साल भर के महत्वपूर्ण दिवस: जनवरी महीनेँ के महत्वपूर्ण दिवस 1 जनवरी = सेना चिकित्सा कोर स्थापना दिवस, नया साल दिवस, विश्व शांति दिवस, विश्व परिवार दिवस...

Sunday, November 16, 2014

खबर साफ्ट तो हेडिंग हार्ड - 2

खबरों की जान है शीर्षक - 6

आइए लेते हैं खबरों की खबर - 10


उदाहरण दो - शहर गोरखपुर। एक अभियान प्लान किया गया। नाम दिया गया - क्यों न काटे मच्छर। इस कालम के तहत नगर निगम की कारगुजारियों, कमियों और शहर भर में व्याप्त  गंदगियों पर स्टोरी बन रही थी, छप रही थी। एक खबर बनी शहर के नालों पर। आलम यह था कि शहर के सभी नाले जाम थे और खबर भी इसी गंदगी को परोस रही थी। मदद कर रहे थे फोटो, जो बता रहे थे कि यहां के नाले-वहां के नाले बजबजा रहे हैं, उबल रहे हैं। अब मौका था ब्रेन ड्रेन का। क्यों? इसलिए कि नालों पर निश्चित रूप से इसके पहले भी खबरें छप चुकी होंगी, फोटो छप चुके होंगे।

तो शुरू हुई चर्चा। दो ही बातें थीं। एक नालों की गंदगी, दूसरी इसकी सफाई में लापरवाही। सवाल था लापरवाह कौन? जवाब भी तय था नगर निगम, उसके मुलाजिम। अगला सवाल था आखिर नगर निगम सफाई क्यों नहीं करता? क्या लापरवाही है? जवाब जो आया, वह चौंकाने वाला था। यानी लापरवाही तो बहुत बाद की बात है, बड़ी बात है लूट। लूट? हां, लूट पैसों की लूट। पैसों की लूट? हां, नाला सफाई के नाम पर नगर निगम को जो पैसे खर्च करने होते हैं, उसे मिल-बांट कर हजम कर लिया जाता है। यह बड़ी राशि है साहब। तो अगला जो वाक्य था, वही शीर्षक बन गया और लगातार चलने वाली एक बोझिल स्टोरी सिर्फ उसी हार्ड हेडिंग के बल कल की सनसनी थी, खलबली थी। नगर निगम से लेकर जिला प्रशासन तक को झकझोर रही थी, अलार्म कर रही थी, बड़े घपले का पर्दाफाश कर रही थी, सरकार को कदम उठाने पर मजबूर कर रही थी। यह हेडिंग थी - नाला नहीं, खजाना साफ।

उदाहरण तीन - पश्चिम चंपारण जिले के भितिहरवा (गांधी आश्रम) में कांग्रेस का कार्यकर्ता सम्मेलन था। राहुल गांधी आ रहे थे। सुरक्षा कड़ी थी। सिर्फ कार्यकर्ताओं को ही जाने की इजाजत थी, जबकि भितिहरवा के भोले-भाले ग्रामीणों को हुजूम राहुल को एक नजर देखने भर को बेताब था,  बैरिकेडिंग तोड़ देने पर उतारू था। राहुल वायुसेना के हेलिकाप्टर से आए। कार्यकर्ता सम्मेलन, सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ पर अलग-अलग कई हार्ड खबरें बनीं। निश्चित रूप से खबरें-फोटो पहले पन्ने से अंदर तक कवर हो रहे थे। सभी खबरें प्रेषित कर लौटने के दौरान रास्ते में स्टेट एडीटर का सुझाव आया कि एक ऐसी साफ्ट खबर बने जिसकी हेडिंग हार्ड हो, जो पूरे माहौल को फोकस करती हो और जो दिलों में घुस जाए, लोगों को याद रह जाए। यदि इसमें राहुल की थोड़ी प्रशंसा भी होती है तो हो जाए।

सभी खबरें लिखी जा चुकी थीं। मगर, सुझाव स्टेट एडीटर का था। सो, शुरू हो गया ब्रेन ड्रेन। दिमाग में बिजली की तरह एक ही बात कौंधी कि राहुल के आने, कार्यकर्ताओं को संबोधित करने और भितिहरवा से दरभंगा के लिए उड़ जाने के दौरान कॉमन क्या था। क्या था?? क्या था जो समय के बदलते नहीं बदला? क्या था जो तब भी था जब राहुल आए और तब भी था जब राहुल गए? निश्चित रूप से स्टोरी साफ्ट थी, मगर इसकी हेडिंग हार्ड का दर्जा पाने वाली थी। और लौटकर बेतिया पहुंचते वह कामन वस्तु मिल गई थी, हेडिंग भी बन गई थी। शीर्षक था - तेरा मुस्कुराना गजब ढा गया। यह मुस्कुराहट ही थी जो तब भी राहुल के चेहरे पर चस्पा थी जब वे हेलिकाप्टर से उतरे, तब भी थी जब कार्यकर्ता सम्मेलन में थे, तब भी थी जब बैरिकेडिंग की ओर उतारू भीड़ से हाथें मिला रहे थे, तब भी थी जब कस्तूरबा बालिका विद्यालय में शिक्षक से बातें कर रहे थे और तब भी थी जब हेलिकाप्टर से आगे की उड़ान भर रहे थे। यह हेडिंग उस रोज दैनिक जागरण की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भी बाजी मार ले गई।

तो क्या अब भी यह बताने की जरूरत है कि साफ्ट खबर की डिमांड हार्ड हेडिंग ही होती है? क्या यह भी बताने की जरूरत है कि आखिर यह लगाई कैसे जाती है? यदि नहीं तो अगला वाक्य याद रखिए। यदि आप अखबार की दुनिया से जुड़े हैं, खबरों का सरोकार जीते हैं तो मान लीजिए आपके लिए यह बहुत ही आसान है, बहुत ही आसान। हेडिंग को लेकर कुछ और महत्वपूर्ण बातें अगली पोस्ट में। इंतजार कीजिए। 

Thursday, November 13, 2014

खबर साफ्ट तो हेडिंग हार्ड - 1

खबरों की जान है शीर्षक - 5

आइए लेते हैं खबरों की खबर - 9

आसान है साफ्ट खबरों के लिए हार्ड हेडिंग लगाना, बहुत ही आसान है। शर्त सिर्फ एक ही है कि आपको उस खबर में डूबना होगा, डूबना होगा, खबर की भावनाओं को आत्मसात करना होगा। ऐसा कौन कर सकता है, सवाल यह भी है। ऐसा नहीं है कि आपको कहा कि आप खबर में डूब जाएं, आप डूब गए और हेडिंग निकल आई। कभी-कभार तो ऐसा हो सकता है और परिणाम काफी सुखदकारी हो सकता है, पर आपकी लेखनी लगातार ऐसे शीर्षक उगलती रहें, इसके लिए यह भी जरूरी है कि आप लगातार अध्ययनशील हों, भ्रमणशील हों, बहुत सारा प्यार का जज्बा हो तो अंदर से गुस्सा भी फूटे। और यह सब कुछ हुआ तो हार्ड खबर की साफ्ट या साफ्ट खबर की हार्ड हेडिंग निकलने में देरी नहीं होने वाली। खबरों की जान हैं शीर्षक के पहले आलेख में मैं जिन तीन कहानियों और उनके शीर्षकों क्रमशः मुखियों की फौज मार रही मौज, पछुआ ने लीची को लूटा व सपने चूमेंगे आसमान का जिक्र कर चुका हूं, वे यही हैं, साफ्ट खबर की हार्ड हेडिंग। आइए, कुछ और उदाहरणों से समझते हैं, निश्चित रूप से तस्वीर साफ होगी।

उदाहरण एक - विश्व कैंसर दिवस पर खबर बननी थी। संवाददाता ने जो खबर दी, वह आंकड़े पेश कर रही थी। साल दर साल बढ़ते कैंसर मरीजों के। खबर यह भी बता रही है कि किस-किस प्रकार के कैंसर होते हैं और इलाका विशेष में किस प्रकार का कैंसर पनप रहा है। फोकस क्यों पर भी था। सबसे बाद में थी उस जिले में कैंसर की जांच और इलाज की व्यवस्था का हाल। पूछने पर बताया गया कि कैंसर तो लाइलाज ही होता है। अब इसके लिए क्या और कैसे खबर बनाई जाए। आंकड़ों की बात है और बात यह है कि इस इलाके में भी यह रोग बढ़ रहा है। खबर में डूबने की बात थी और डूबा मन कह रहा था कि सारी बातें किस्तों में छप चुकी हैं। इसकी तो कोई हार्ड हेडिंग होनी चाहिए, व्यवस्था पर चोट करने वाली हेडिंग होनी चाहिए, हेडिंग ऐसी होनी चाहिए कि कल अखबार में दिखे तो सिर्फ यही। कल शहर की जुबां पर चर्चा हो तो सिर्फ इसी एकमात्र हेडिंग की।

शुरू हुई मशक्कत। संवाददाता के साथ ब्रेन स्टार्मिंग। पूछा, कैंसर के इतने रूप आपके इलाके में पसर गए हैं, क्या यह बात सिर्फ आपको मालूम है? जवाब - नहीं, महकमे के सभी अधिकारी इस बात को जानते हैं, आंकड़े तो विभाग से ही लिए गए हैं। सवाल - अच्छा, तो उन्होंने क्या किया? जवाब - क्या करते, बस बातें करते हैं, करना तो सरकार को है। सवाल - सरकार को यानी? जवाब - सर, राजधानी में कैंसर अस्पताल है, यहां तो बस एक यूनिट बनाकर उसे कैंसर यूनिट का नाम दे दिया है। यहां जांच की तो सुविधा ही नहीं है, इलाज कहां से करेंगे? सवाल - तो क्या करते हैं अस्पताल में? जवाब - सही मायने में देखा जाए सर तो मरीजों को इलाज के नाम पर बरगलाते हैं, उनका समय खराब करते हैं और बात जब बूते से बाहर हो जाती है तो मरीज को राजधानी रेफर कर देते हैं।

रिपोर्टर की बात भयानक थी। खबर निश्चित रूप से साफ्ट थी। कैंसर दिवस विशेष पर छपने वाली थी, मगर नेचर हार्ड हो रहा था, सो हेडिंग भी हार्ड बनी। क्या? थोड़ी देर सोचिए, सूझे तो ठीक, न सूझे तो अगली लाइन पढ़िए। डाक्टरों का मरीजों को बरगलाकर टाइम खराब करने वाली बात हैमर कर रही थी, यही पाठकों को बताने को विवश भी कर रही थी। जो डाक्टर मरीज के अंतिम क्षणों में कह रहे थे, अखबार उसे पहली लाइन में ही कह देना चाहता था। हेडिंग बनी - कैंसर है, भागिए पटना। इसकी दूसरी हेडिंग थी- इलाज तो छोड़िए यहां जांच की भी नहीं है व्यवस्था। खबर छपी। वह दिन था, अखबार था, व्यवस्था थी, इलाके का पाठक वर्ग था। सब एक दूसरे में समाहित। एक ही आकर्षण - कैंसर है तो भागिए पटना।

बहुत दिनों के बाद लिखा, लेकिन जहां तक मैं समझता हूं, खबर साफ्ट तो हेडिंग हार्ड, के तहत प्रेरक शुरुआत हो गई है। इस पर अभी और बातें होंगी। उदाहरण दो के साथ आएगी अगली पोस्ट, इंतजार कीजिए। 

Friday, April 4, 2014

खबर हार्ड तो हेडिंग साफ्ट - 3

खबरों की जान हैं शीर्षक -4

आइए लेते हैं खबरों की खबर - 8
इसके पहले कि बात आगे बढाऊं, आपको एक शीर्षक सुझाता हूं। इसे जरा उस खबर पर फिट करके देखिए, जिससे बात शुरू हुई और इतनी दूर तक निकल आई। शीर्षक है - पूछ रहीं मासूम आंखें, मेरा गुनाह क्या? बात हार्ड खबर दिनदहाड़े युवक की हत्या के साफ्ट शीर्षक लगाने की थी। अब इस शीर्षक को हत्या की खबर पर फिट कर देखिए। मासूम आंखें उस युवक की पत्नी की हो सकती हैं, उसके बूढ़े माता-पिता की हो सकती हैं, उसके बच्चों की हो सकती हैं। बस, दिनदहाड़े हुई हत्या की खबर लिखने से पहले आपको सिर्फ इतना करना होगा कि उसके उन परिजनों के बारे में पता करना होगा, उनसे मिलना होगा और उनसे बात करनी होगी। इस खबर की सब हेडिंग बनाइए - बदमाशों ने दिनदहाड़े छीना मासूम के सिर का साया, हत्यारों ने छीना बुढ़ापे का सहारा, उजाड़ दिया सुहाग, सुहागिन के सपने चकनाचूर आदि आदि..। 


गोरखपुर की बात है। अगवा कर एक लड़की से सामूहिक बलात्कार किया गया। बाद में लहूलुहान हालत में उसे फेंक दिया गया। लड़की जब अस्पताल में भर्ती हुई तो खबरनबीशों को इसकी जानकारी मिली। अब शुरू हुई खबर लिखने और खबर के पीछे की खबर ढूंढ़ने की मशक्कत। फोटोग्राफर ने एक अच्छा काम किया। उन्होंने बेड पर पड़ी लड़की के चेहरे का एक ऐसा क्लोजअप फोटो लिया, जिसमें लड़की की आंखें पूरी व्यथा को न केवल खोल रही थीं, बल्कि देखने वाले को सहानुभूति और गुस्सा दोनों से भर रही थीं। सवाल था, इस हार्ड खबर का साफ्ट शीर्षक क्या हो? समीकरण वही फिर सामने था, हेडिंग साफ्ट होनी चाहिए। ...और शीर्षक लगा - आंखों में सवाल, मेरा लड़की होना गुनाह? यकीन कीजिए, कल जिसने भी शीर्षक पढ़ा, रोमांचित हो गया, फीडबैक यही था।

शहर में लूट की वारदात हुई। लुटेरों ने दंपती को बांधकर इत्मीनान से डेढ़ घंटे तक घर को खंगाला और नकदी-जेवर के साथ जरूरी टीवी-फ्रिज, वाशिंग मशीन, गैस स्टोव जैसे घरेलू सामान भी ले गए। मध्यम वर्ग के इस परिवार ने कई वर्षों में जरूरी खर्चे काट-काट कर और एक-एक कर इन्हें जुटाए थे। निश्चित रूप से यह चोरी उन पर भारी पड़ गई, वे कंगाल हो गए। इस हार्ड खबर की भी साफ्ट हेडिंग ही निकली और सच में लाजवाब रही, प्रतिद्वंद्वियों को लाजवाब कर गई। शुरू में संवाददाता ने इसकी हार्ड हेडिंग ही लगाई थी, जो जम तो रही थी मगर दूसरे अखबारों से आगे निकलने का माद्दा नहीं दिखा रही थी। बातें शुरू हुईं तो बात पकड़ में आई। बात उस घर की महिला की थी, जो चोरी की घटना के बाद हर किसी से कह रही थी। क्या? जो कह रही थी वही शीर्षक बन गया। आप भी सुनिए - अब कहां से खरीदूंगी टीवी, कैसे पकेगा खाना। महिला का अगला वाक्य सब हेडिंग बन गई - डेढ़ घंटे में लुटेरों ने कंगाल बना दिया।

मुझे लगता है, उदाहरण कई हो गए, बात भी समझ में आ गई होगी। यानी हार्ड खबर की साफ्ट हेडिंग हार्ड खबर को और हार्ड बना देती है, आपको प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे ले जाती है और पढ़ने वालों को पूरी खबर पढ़ने के लिए पन्ने पर रोक देती है। रोक देती है नहीं? यदि मानते हैं कि रोक देती है तो आप भी शुरू कीजिए हार्ड खबर की साफ्ट हेडिंग लगाना। इस कला में आप रातोरात सिद्ध नहीं हो पाएंगे। कोई रातोंरात होता भी नहीं। लेकिन, यदि मानसिकता बन आई तो मेरा दावा है कि इस कला में पारंगत हो जाने में आप भी खुद को नहीं रोक पाएंगे। अब अगली चर्चा होगी - कैसे बनाते हैं साफ्ट खबर की हार्ड हेडिग। 

Wednesday, February 26, 2014

खबर हार्ड तो हेडिंग साफ्ट - 2

खबरों की जान हैं शीर्षक -3
आइए लेते हैं खबरों की खबर - 7

सवाल है कि हत्या, लूट और बलात्कार जैसी घटनाओं की हेडिंग साफ्ट कैसे की जाए?  उदाहरण से समझिए। एक युवक की दिनदहाड़े बदमाशों ने बीच बाजार गोली मार कर हत्या कर दी। एक ने हेडिंग बनाई -दिनदहाड़े बीच बाजार युवक की हत्या, दूसरे ने लिखा - सरेआम गोलियों से भूना, तीसरे ने शीर्षक बनाया - पुलिस का इकबाल ध्वस्त, सरेआम खून, चौथे ने लिखा - हत्यारों का राज!, पांचवें ने हेडिंग बनाई - बाइक से उतरे, पिस्तौल सटाई और दागने लगे गोलियां। ये सब हार्ड खबर की हार्ड हेडिंग है। आपको नहीं जंचती। आपके सामने सवाल है साफ्ट हेडिंग लगाने का? क्या लगाएं?

इसी परिप्रेक्ष्य में एक और उदाहरण पर  गौर फरमाइए। शाम में चार बजे एक सूचना आती है कि शहर से बीस किलोमीटर की दूरी पर ड्राइवर की लापरवाही से ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई। अब सारा फोकस ड्राइवर पर। थोड़ी देर बाद सूचना अपडेट हुई कि ड्राइवर नशे में था। फिर अपडेट हुई कि ड्राइवर ४८ घंटों से लगातार ड्यूटी पर था। फिर अपडेट हुई कि सिग्नल था नहीं औऱ ड्राइवर ने ट्रेन रोकी नहीं। सारा फोकस ड्राइवर की लापरवाही पर हो गया और हेडिंग उसी के इर्द गिर्द बन गई। रिपोर्टर खुश, काम हो गया। डेस्क का साथी खुश, मिल गई एक हार्ड खबर। कल संपादक भी खुश कि खबर छूटी नहीं।

लेकिन, एक संवाददाता ऐसा निकला जो अपडेट होती सूचनाओं पर टिका बैठा नहीं रहा। वह पहुंच गया स्पाट पर, मिल लिया ड्राइवर से, बातें कर लीं उन लोगों से जो स्पाट पर मौजूद थे। अब उसकी हेडिंग थी - बचा ली ग्यारह मासूमों की जान। दरअसल उसे पता यह चला कि ड्राइवर ने क्रासिंग पर फंसे उस टेम्पो को देख लिया था, जिसमें ग्यारह स्कूली बच्चे सवार थे। उसे पता चल गया था कि ड्राइवर न तो नशे में था, न ही उसने किसी नियम को तोड़ा था।

अपना सवाल फिर वही है। खून खराबे वाली हार्ड खबर की हेडिंग साफ्ट कैसे बने? ट्रेन दुर्घटना का विश्लेषण गवाह है, रिपोर्टर को मेहनत करनी होगी। टेक्स्ट बटोरना होगा। गहन अन्वेषण करना होगा और खबर के साथ दिल से जुड़ना होगा। हेडिंग तो बनेगी ही, कैसे नहीं बनेगी? आखिर बात तो पूरी हो, सूचना तो पूरी हो, मालूमात तो पूरे हों। ये सब होंगे तभी तो बनेगी कुछ संभावना।

इसके पहले कि दिनदहाड़े हत्या की कुछ साफ्ट हेडिंग सुझाऊं, एक और दृष्टांत पर गौर फरमाइए। फिर बात ट्रेन की। वक्त भी वही रखिए, यानी शाम के चार बजे। पता चलता है कि राजधानी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गई और करीबन डेढ़ सौ लोग मारे गए। अब लड़ाई शुरू हो गई मारे जाने वालों की संख्या ज्यादा से ज्यादा दिखाने की। कोई अखबार लिखता है १५० मरे, कोई लिखता है १५८ तो कोई १७५। जाहिर है, राजधानी दुर्घटनाग्रस्त तो वे लिखेंगे ही। अब जरा सोचिए, घटना शाम चार बजे की है। यदि आप अखबार के लिए खबर लिख रहे हैं तो वह बहुत जल्दी भी वह पाठक के पास पहुंची तो कम से कम पंद्रह-सोलह घंटे तो गुजर ही चुके होंगे। मान लेते हैं, किसी रिपोर्टर को यह भी ख्याल आया। अब चूंकि उसका फोकस मृतकों की संख्या है, इसलिए वह देर रात तक अस्पताल खंगालेगा और उसमें दो चार की और बढोतरी कर लेगा। काम खत्म, खबर कवर?

लेकिन, एक भाई ऐसा निकला जो  यह पता करने लगा कि राजधानी एक्सप्रेस आखिर दुर्घटनाग्रस्त हुई तो कैसे हुई? राजधानी का मतलब अतिरिक्त विभागीय सतर्कता, अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था। अब उसे पता चला कि यह विभागीय कोई बड़ी लापरवाही थी, उसे पता चला कि यह बड़ी नक्सली साजिश थी और उसकी हेडिंग बन गई बड़ी लापरवाही या बड़ी नक्सली साजिश। आप स्वयं कल्पना कर सकते हैं कल अखबार कौन सा भीड़ में अलग दिखेगा, उस भीड़ से कौन सा अखबार उठेगा।

अपना सवाल तो फिर वही है। उस दिनदहाड़े खून की साफ्ट हेडिंग क्या हो? उम्मीद है कुछ हेडिंग आपको सूझने लगी होगी। नहीं, तो बातें अगली पोस्ट में।

Thursday, February 20, 2014

खबर हार्ड तो हेडिंग साफ्ट

 खबरों की जान हैं शीर्षक - 2
आइए लेते हैं खबरों की खबर -6


जमशेदपुर की बात है। पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में राजनीति की दिशा और दशा पर हफ्तेवार पूरा पेज लिखने वाले बुजुर्ग पत्रकार केदार महतो (अब इस दुनिया में नहीं हैं) कहा करते थे कि यदि खबर हार्ड हो तो शीर्षक साफ्ट बनाइएगा और खबर साफ्ट हो तो शीर्षक को हार्ड कर दीजिएगा। हमलोग उन्हें चाचा कहा करते थे। जब पूछता कि चाचा, जरा विस्तार से बताइए तो कहते खुद सोचिए। बड़ी मुश्किल थी, कोफ्त भी होती थी। पहले तो बात समझ में ही नहीं आई। पर, इतना जरूर हुआ कि दिमाग चलने लगा। जब कभी हार्ड खबर लेकर बैठता तो साफ्ट हेडिंग सोचने लगता। जब कभी साफ्ट खबर लेकर बैठता तो हार्ड हेडिंग सोचने लगता। अजीब मुसीबत थी। आप विश्वास करिए, यह मशक्कत हर खबर की हेडिंग के लिए होने लगी। और नतीजा बड़ा चमत्कारिक था। अखबार चमकने लगा था।

तो मुद्दे पर आएं। क्या हो हार्ड खबर की साफ्ट हेडिंग और साफ्ट खबर की हार्ड हेडिंग? अमूमन होता यह है कि जब किसी अधिकारी या विभाग की कलई खोलती हार्ड खबर लिखी जाती है तो संवाददाता या डेस्क के साथी हेडिंग को भी हार्ड ही रखते हैं। लेकिन, जरा रुकिए, सोचिए..। क्या इसकी कोई साफ्ट हेडिंग हो सकती थी जो तीर की तरह सीधे दिलोदिमाग में घुस जाती? सोचिए कि क्या यह खबर किसी विभाग या किसी अधिकारी के भ्रष्टाचार की कलई खोलती पहली खबर बन रही है? क्या वह पहला विभाग है या पहला अफसर है जो भ्रष्टाचार में लिप्त है? तो सोचिए कि आप इस खबर का शीर्षक हार्ड बनाने पर क्यों तुले हैं?

खबर में मुख्य रूप से तीन प्राथमिकताएं ही होती हैं। पहली सूचित करना। दूसरी सावधान करना। तीसरी संवाद करना। इन तीन प्राथमिकताओं पर गौर कीजिए। यह हार्ड और साफ्ट की परिभाषा भी समझा रही हैं। मेरा आग्रह तीसरी प्राथमिकता पर है। संवाद की श्रृंखला ही आपको इस फर्क को समझाने लगेगी। सवाल आएगा कि इस खबर को लेकर संवाद किससे? किससे?? फिर सोचिए, इस खबर की बाबत आप संवाद किससे कर रहे हैं। क्या उस आम पाठक से जो अखबार खरीदकर पढ़ रहा है? क्या उस विभाग के आला अधिकारी या सीधे सरकार से? सोचिए, क्या यह संवाद सीधे उस विभाग से या उस अधिकारी से नहीं हो सकता? मुझे लगता है कि अब आपकी हेडिंग बन गई होगी। और एक नहीं, कई हेडिंग्स बन गई होंगी। बनी कि नहीं? चलिए, हम ही कुछ सुझाते हैं। भ्रष्टाचार की कलई खोलती इस तस्वीर के कई साफ्ट शीर्षक हो सकते हैं - मनरेगा में यह क्या हो रहा है सर..., मत बेचिए भूखों का अनाज, आ गया भादो अब क्या करेंगे जॉब कार्ड आदि आदि...।

ग्लैमर की चकाचौंध भरे आज के परिवेश में कहीं कोई भूख से मर जाता है। आपको इसकी खबर बनानी है। बहुत आक्रोश होगा मन में। व्यवस्था के प्रति, समाज के प्रति। क्या लिख दें। मन कर रहा होगा कि गुस्से का कोई आखिरी शब्द हो तो उसे ही उकेर दें। पर सावधान, यह हार्ड खबर बिल्कुल साफ्ट हेडिंग की मांग कर रही है। सोचिए, यदि इसकी हेडिंग आप यह लगा दें  'उफ वो ठंडा चूल्हा, वो चमकते बर्तन' तो क्या कम मारक दिखेगी, क्या कम व्यवस्था को झकझोरेगी, क्या इससे निकलने वाला दर्द कुछ ही लोगों को टीसेगा? सोचिए, सोचिए।

और मतलब समझे? कैसे बनती है हार्ड खबर की साफ्ट हेडिंग? पहली बात, आपको खबर से पूरी तरह जुड़ जाना होगा, उस पूरी घटना को अपने ऊपर हुआ मानना होगा। दूसरी बात, अपनी जुबान को किसी भी कुव्यवस्था या भ्रष्टाचार की वजह से पीड़ित की फरियाद लगाने वाले की जुबान बनानी होगी। और सावधानी भी जरूरी है। यह कि मामला प्रखंड की गड़बड़ी का हो तो दोषी पूरे जिला प्रशासन को मत ठहरा दीजिएगा, दोष जिलाधिकारी के मत्थे मत मढ़ दीजिएगा। फिर खबर जिस असर, जिस परिणाम के लिए लिखी जाएगी, उसमें देरी हो जाएगी।  

अब एक सवाल उठ सकता है कि हत्या, लूट और बलात्कार जैसी हार्ड खबर की हेडिंग साफ्ट कैसे की जाए? है न रोचक सवाल? तो जवाब अगली पोस्ट में।