Friday, July 31, 2015

चलिए प्रेमचंद के गांव लमही

लमही में कथा सम्राट प्रेमचंद के घर के सामने।
जिन्होंने साहित्य को दिशा दी, दलितों को आकाश। जिन्होंने लेखन को शैली दी, विचार को धाराएं। जिन्होंने हर वर्ग के लिए कलम चलाई और जो 'मानसरोवरÓ के सात भागों में छपीं। जिन्होंने 'हंसÓ को उड़ान दी, भाषा को नवजीवन। जिन्होंने दरिया ए गंगा के किनारे हिलाल की शक्ल में आबाद काशी को दिलफरेब वाला मंजर बताया। उन्हीं प्रेमचंद का गांव है लमही। आपके मन में भाषा की सहजता, साहित्य के उदात्म चरित्र के प्रति सामान्य जज्बा भी जीवित होगा तो इस गांव की मिट्टी को चंदन समझकर माथे से लगा लेंगे। रोज नहीं तो 31 जुलाई (जयंती) और 8 अक्टूबर (पुण्यतिथि) को तो अवश्य ही। अफसोस! यहां इन अवसरों पर जाने के लिए आपको बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। आइए, आपको साहित्य के इस महान तीर्थ लमही तक लें चलें।
लमही में कथा सम्राट प्रेमचंद के स्मारक के पीछे।
अगर आप उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से या बिहार की राजधानी पटना से आना चाहते हैं तो आपको ट्रेन या बस से आना होगा वाराणसी स्टेशन या कैंट रोडवेज। यहां से महज आठ किलोमीटर पर है लमही। यात्रा टुकड़ों में होगी। नहीं मिलेगी कोई सीधी सवारी, चमचमाती सड़क। एक आटो से पहले जाना होगा पांडेयपुर चौराहा, फिर दूसरे से पहुंचिएगा लमही। सीधे जाना चाहते हैं तो पूरा आटो करना होगा। फिर शुरू होगा सफर। सफर कि ईश्वर याद आ जाएं।
पांडेयपुर चौराहे तक तो जाम के झाम में उफ-आह कर पहुंच जाएंगे। इसके बाद लगेगा ही नहीं कि किसी शहर की सड़क पर स्वच्छ वातावरण में किसी साहित्यकार की धरती तक जाने के रास्तेे पर हैं। सड़कों के बड़े-बड़े गड्ढे और उन पर छाए धूल के गुबार से बच गए तो कुछ दूर सड़क के दोनों किनारे आपको जीर्ण-शीर्ण और उजड़े चमन का नजारा 'विकासÓ की पटकथा लिखता नजर आएगा। इस दौरान भूल से भी किसी ऐसे शिलापट्ट की कल्पना मत कीजिएगा, जिस पर यह लिखा मिले कि रास्ता महान कलमकार के गांव तक जाता है। पांडेयपुर चौराहे पर लगी है प्रेमचंद की मूर्ति। ताज्जुब हुआ कि मूर्ति भी आने वालों को नहीं दिखती। एक तो यह पता ही नहीं चलता कि ओवरब्रिज के नीचे जाम के झाम में गोल घेरा है क्या। दूसरे मूर्ति उस पार लगी है और लमही से लौटने वालों को ही दिखती है।
इतिहास को खंगालने वाले जानते हैं कि साहित्य सृजन के प्रति प्रेमचंद का लगाव कितना गहरा था। समय- काल और परिस्थितियों से उनकी कलम सीधी टक्कर लेती थी। जिस चरित्र को उन्होंने बरसों पहले कथाओं में सहेजा, वे आज भी घूमते नजर आते हैं। 'सोजे वतनÓ देश प्रेम के प्रति जज्बा जगाने वाली उनकी वह कृति थी, जिसे ठीक उसी तरह प्रतिबंधित किया गया, जैसे आजादी के दीवानों को फांसी पर चढ़ा दिया जाता था। प्रेमचंद की धर्मपत्नी शिवरानी देवी ने 'प्रेमचंद घर मेंÓ में कथा सम्राट से संबंधित जिन घरेलू बातों की चर्चा की है, उनमें हंस का प्रकाशन होता रहे, इसके प्रति उनकी समर्पण भावना का अनूठा चरित्र सामने आता है।
घटनाएं बानगी हैं। प्रेमचंद का पोर-पोर देश प्रेम, समाज के उत्थान और साहित्य सृजन से जुड़ा है। किसी बच्चे से किसी साहित्यकार का नाम पूछ लीजिए, उसकी जुबान पर सबसे पहले आता है प्रेमचंद। उनके साहित्य और सृजनशीलता का आनंद लेने वालों का भी पोर-पोर इनका ऋणी होना चाहिए। और कुछ नहीं तो इतना तो होना ही चाहिए कि वाराणसी और यहां तक आने सभी स्टेशनों-बस अड्डों पर लिखा मिले कि यहां से उतरकर आप प्रेमचंद की मिट्टी को प्रणाम करने जा सकते हैं। मान लेते हैं कि किन्हीं कारणों से इन स्थानों पर सूचना पट्ट नजर नहीं आते, लेकिन वाराणसी में तो यह नजर आना ही चाहिए था। आप स्टेशन या रोडवेज से लमही की ओर जाते रास्तेे में इस सूचना को तलाशेंगे तो आंखें तरसती रहेंगी।
और हां, इस रास्ते पर बढ़ते सीधा मत देखते चलिए। लमही छूट जाएगी, आप आगे निकल जाएंगे। मुख्य सड़क से जो रास्ता फूटा है, उस ओर ही लमही का संकेत मिलेगा। बहरहाल, इन सब बातों से हमारे-आपके ऊपर तो फर्क पड़ता है, लमही पर नहीं। यह मिट्टी तो साहित्य का चंदन है। इसे माथे पर लगाइए।
(दैनिक जागरण के वाराणसी संस्करण में ३१ जुलाई को पेज वन पर प्रकाशित)

...तो प्रेमचंद से ऐसे जुड़ गया 'मुंशी'
प्रेमचंद अध्यापक रहे, कायस्थ भी थे। तब अध्यापकों को मुंशी जी कहा जाता था, कायस्थों के नाम के पहले भी सम्मान स्वरूप मुंशी लगाने की परंपरा रही है। लोगों को लगता है, इसीलिए प्रेमचंद हो गए मुंशी प्रेमचंद। लेकिन, यह पूरा सच नहीं है।
प्रेमचंद के सुपुत्र एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार अमृत राय ने एक पत्र में उल्लेख किया है, प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे मुंशी शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। हालांकि, उनका यह भी मानना है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है, जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने कभी लगा दिया होगा।
इस संबंध में प्रेमचंद की धर्मपत्नी शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक 'प्रेमचंद घर मेंÓ में प्रेमचंद से संबंधित सभी घरेलू बातों की चर्चा की है, पर कहीं भी उनके लिए मुंशी का प्रयोग नहीं हुआ है। हालांकि, शिवरानी देवी ने इसी पुस्तक में दया नारायण जी के लिए मुंशी जी शब्द का प्रयोग कई बार किया है।
प्रेमचंद के नाम, जो प्रकाशकों ने उनकी कृतियों पर छापे हैं, उनमें क्रमश: श्री प्रेमचंद जी (मानसरोवर प्रथम भाग), श्रीयुत प्रेमचंद (सप्त सरोज), उपन्यास सम्राट प्रेमचंद धनपतराय (शिलालेख), प्रेमचंद (रंगभूमि), श्रीमान प्रेमचंद जी (निर्मला) आदि कृतियों पर भी कहीं भी मुंशी का प्रयोग नहीं हुआ है।
तो कैसे जुड़ा प्रेमचंद के नाम के साथ मुंशी विशेषण? एकमात्र कारण जो दिखता है, वह यही है कि हंस नामक पत्र प्रेमचंद एवं कन्हैयालाल मुंशी के सह संपादन मे निकलता था। इसकी कुछ प्रतियों पर कन्हैयालाल मुंशी का पूरा नाम न छपकर मात्र मुंशी छपा रहता था, साथ ही प्रेमचंद का नाम इस प्रकार छपा होता था -  
संपादक
मुंशी, प्रेमचंद।
समझा जाता है कालांतर में पाठकों ने मुंशी तथा प्रेमचंद को एक समझ लिया और प्रेमचंद, मुंशी प्रेमचंद बन गए। अब तो प्रेमचंद के साथ मुंशी शब्द इतना गहरा जुड़ गया है कि सिर्फ मुंशी से ही प्रेमचंद का बोध हो जाता है। यह सहज भी लगता है। प्रेमचंद का शिक्षक व कायस्थ होना बाद में उनके नाम के आगे के मुंशी को मजबूत करता चला गया...।

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