Wednesday, August 8, 2018

आज भगत जी का चेहरा देखा न गया

मुजफ्फरपुर में घर से दफ्तर के बीच है संयुक्त कृषि निदेशक का कार्यालय। इसी के सामने भगत जी की पान की दुकान है। खुशमिजाज भगत जी... बात-बात मे बच्चों सी किलकारियां मारने वाले भगत जी। दफ्तर आते-जाते उनके हाथों का एक पान खाने का रुटीन रहा है, सो, भगत जी से न जाने कब एक आत्मीय रिश्ता सा बन गया, पता भी नहीं चला।
पता चला आज...!
कुछ दिनों से बंद थी उनकी दुकान, सो पान खाने का सिलसिला भी थम गया था। अभी दो दिनों पहले दफ्तर से लौट रहा था तो दुकान खुली थी और भगत जी काउंटर के पीछे खड़े होकर पान बेच रहे थे।
फिर क्या था, मेरी मोटरसाइकिल उनकी दुकान की ओर मुड़ी और रुक गई।
मोटरसाइकिल से ही हलकारा लगाया, पान खिलाइए भगत जी।
उन्होंने मेरी ओर देखा, मगर यह क्या, सदा हंसकर स्वागत करने वाला भाव उनके चेहरे से गायब था। निगाहों से उनके चेहरे का मुआयना किया। सिर, दाढ़ी मूंड़े हुए थे।
पूछा - क्या हुुआ?
बोले - परिवार में एक खटका हुआ था। (खटका मतलब परिवार में किसी की मौत)
वे पान बनाने में मशगूल हो गए। लेकिन, पान खाने के बाद चूना लेने और उसे जीभ पर लगाने से पहले मैंने पूछ ही लिया। कौन थे?
उनका सपाट एक शब्द जो जुबान से निकला, वह था - पत्नी।
क्या...! आपकी पत्नी गुजर गईं?
बोले - हां।
और भगत जी के चेहरे पर जो तकलीफ उभरी, उसका बयां नहीं कर सकता।
फिर बोले - कई बीमारियां थीं, इलाज करा रहा था, नहीं बची।
कहां इलाज करा रहे थे?
यहीं, मुजफ्फरपुर में ही...।
मेरे मुंह से स्वतः निकला - बड़ा कष्ट हो गया भगत जी...!
और वे बोलते चले गए - हां, बड़ा कष्ट हो गया..., बड़ा कष्ट हो गया...।
भगत जी बोल रहे थे और उनका चेहरा गम के गहरे समंदर में डूबता चला जा रहा था। उस समंदर में गोते लगा रहे थे उनके बच्चे की लावारिस परवरिश और खुद उनका अधूरा पड़ा आगे का पूरा जीवन...।
एक तस्वीर दिमाग में उभरी।
पत्नियों पर हम न जाने क्या क्या जोक बनाते हैं, मुहावरों-जुबानों में हम उन पर कितना तंज कसते हैं, उन्हें नीचा दिखाने का कोई मौका कभी नहीं छोड़ते हैं...
भगत जी का चेहरा कह रहा था, लोग गलत करते हैं।
और दो दिनों बाद आज फिर उनकी दुकान से गुजरा तो पान खाने रुक गया।
भगत जी ने अपना जीवन सामान्य कर लिया है। पेट की मजबूरी, गम गलत कर देती है, मगर उसके निशान नहीं मिटा सकती।
भगत जी के चेहरे से बच्चों सी किलकारी वाला स्वागत भाव नहीं मिल रहा था, वहां गम का समंदर आज भी ठाठें मार रहा था।
आज भगत जी का चेहरा मुझसे देखा न गया।
कब उन्होंने पान बनाया, कब मैंने उसे मुंह में रखा और कब मैं मोटरसाइकिल चालू कर वहां से आगे बढ़ चला, मुझे भी पता नहीं चला। भगत जी से कोई बात करना सूझ ही नहीं रहा था...!
घर पहुंच चुका हूं और दिमाग में दो बातें खलबली मचा रही हैं।
एक कि आज मैंने भगत जी से आत्मीय होकर कोई बात क्यों नहीं की? यह आत्मीयता का परिचायक है या किसी को जीवन की अंधी दौड़ में अकेला छोड़ देने की आम मानवीय प्रवृति?
दूसरी बात यह कि क्या पत्नियों के बगैर जीवन इतना एकाकी हो जाता है, इतना वीरान हो जाता है?
क्या इतना...?
मुझे याद आता है वह दिन, जब मेरी मां की मौत हुई थी। उन्हें कैंसर था। आपरेशन के बाद लंबा इलाज चला, मगर वे नहीं बचीं। मेरी गोद में ही उनका सिर था, जब मैं उन्हें गंगाजल पिला रहा था और जब उन्होंने अंतिम सांसें लीं।
पिताजी दरवाजे पर थे। भीतर से जब रुलाई की आवाज सुनी तो वे समझ गए। सन्निपात की अवस्था में वे उस कमरे में आए, मां को निहारा, उनके चेहरे पर हाथ फिराए और फिर बाहर दरवाजे पर आकर बैठ गए। चुपचाप।
उनकी आंखों से अविरल अश्रुधाराएं बह रही थीं। ऐसी कि मानो समंदर फूट पड़ा था, बिना गर्जन, बिना तर्जन....। मानो वे धाराएं अब रुकने वाली ही नहीं थीं।
अब हमारे लिए पिताजी की अश्रुधाराएं मां की मौत पर भारी थीें। इतनी कि मैं गांव के उनके मित्र शृंखला के लोगों को उन्हें सांत्वना देकर किसी तरह उन्हें सामान्य करने की मनुहार करने लगा।
मुझे याद आते हैं वे दिन...
जिस तरह आज भगत जी का चेहरा मुझसे देखा न गया, ठीक उसी तरह मुझे तब अपने पिताजी का चेहरा नहीं देखा जा पा रहा था...!

Monday, May 2, 2016

एक वह दिन था और एक यह

गंगा वही थीं, लेकिन घाट बदला हुआ था। तब दशाश्वमेध घाट पर लगा था मंच और आज नजारा था अस्सी घाट पर। तब काशीवासियों के सामने थे सांसद नरेंद्र मोदी और आज थे प्रधानमंत्री मोदी। तब कुछ करने का भाव जो भीतर था, वह शब्दों में झलका था। आज वही अभिव्यक्ति ठोस आकार लेकर सामने थी। अनुग्र्रह भाव तब भी था, अब भी था।

अतीत के पन्ने उलटिए तो याद आ जाएगा 17 मई, 2014 की वह शाम, जब मोदी चुनाव जीतने और पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के बाद प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले यहां आए थे। उन्होंने बाबा विश्वनाथ के दरबार में माथा टेका था और दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती में शामिल हुए थे। उस दिन उन्होंने अपने जो उद्गार व्यक्त किए थे, उनमें संकल्पों का पुट था, कुछ करने का इरादा था। हम देश के लिए जिएंगे, हम स्थिति बदल सकते हैं, दुनिया बदल सकते हैं, उम्मीदवारी का फार्म भरते यहां का बेटा हो गया, इस धरती को नमन करता हूं, मां गंगा को नमन करता हूं, यहां के मतदाताओं को नमन करता हूं...। 12 दिसंबर 2015 को जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ भी आए थे मोदी। तब कार्यक्रम सीमित था और दशाश्वमेध घाट से केवल आरती में शामिल हो मुग्ध भाव से गंगा को निहार कर चले गए थे।
रविवार को घाट बदला हुआ था, नजारा भी। चेहरे पर कुछ करने के बाद का विजेता भाव साफ-साफ झलक रहा था। बोल अनुग्र्रह भाव से भरे थे और तेवर गरीबों के लिए कुछ भी कर गुजरने का संदेश दे रहा था। हर-हर महादेव का नारा, काशी की पवित्र धरती, भोले बाबा और मां गंगा के आभार के साथ राजनीति पर जो प्रहार शुरू हुआ, वह रुकने का नाम नहीं ले रहा था। बोले - हमेशा योजनाएं वहीं बनीं, जिनसे वोट बैक मजबूत किया गया। एक साल में रसोई गैस के 25 कूपन बांटकर सांसद यह कहते बधाई लूटते थे कि हमने यह किया वह किया। हमने जो भी योजनाएं बनाईं, वे गरीब को ताकत देती है कि वे खुद अपनी गरीबी को परास्त करके निकलें। प्रधानमंत्री जनधन योजना व मुद्रा योजना के फायदे गिनाए।

भीड़ भले शांत थी। गर्मी से हाथ में लिए कागज आदि को झलते मोदी को बड़े गौर से सुन रही थी, गुन रही थी।  बलिया का जिक्र कि गरीबों को रसोई गैस दिया पर लोगों ने जोरदार तालियां बजाईं। आपने हमें जिताया तो हमसे ज्यादा से ज्यादा फायदा लें पर भीड़ ने फिर चहेते नेता का जोरदार स्वागत किया।
छोटी-छोटी बातों के जरिए मोदी ने रविवार को गरीबों के मनोबल को उठाने का ही सिर्फ प्रयास किया। गंगा पुत्रों के बीच केवल ई-बोट नहीं बांटी, ई-रिक्शे नहीं दिए, बल्कि एक अभिभावक की तरह उसके फायदे भी गिना गए। इशारों-इशारों में बता गए कि पांच सौ रुपये बचेंगे तो क्या करना है। बता गए कि बच्चों पर खर्च करना है। योजनाओं के नाम को लेकर पिछली सरकार पर प्रहार के साथ यह संदेश भी दे गए कि मोदी अलग मिट्टी का बना हुआ है।
(2 मई 2016 को वाराणसी जागरण में प्रकाशित)

Sunday, May 1, 2016

सुने बजरंग बली, सुनाए गुलाम अली

पहली पेशकश ही थी - मैंने लाखों के बोल सहे, सितमगर तेरे लिए...

संकट मोचन का दरबार और संगीत का महाकुंभ। मंगलवार को छह दिवसीय संकट मोचन संगीत समारोह की पहली निशा के सिरमौर थे गजल सम्राट पाकिस्तानी फनकार गुलाम अली। उनकी पहली पेशकश ही यह बता रही थी कि इस दरबार में हाजिरी लगाने के लिए उन्होंने कितनी बाधाएं पार कीं। राग विहाग में दादरा पेश करते जब उनके लब से 'मैंने लाखों के बोल सहे, सितमगर तेरे लिए...' का स्वर फूटा, मंच के सामने बैठा हर श्रोता करतल ध्वनि कर उठा। इसी के साथ संकट मोचन मंदिर का पूरा परिसर जय सियाराम व हर हर महादेव के जयकारे से गूंज उठा। जयकारे पर गजल सम्राट की मुस्कान गहरी हो गई और उनका सुर लय के गहरे सागर में डूब गया।
मंच पर आते ही श्रोताओं में शुरू कुछ गहमागहमी को गुलाम अली ने अपनी गुजारिश से शांत करा दिया। गुजारिश - मैं खुद को सबसे छोटा समझता हूं, मेरी बातें गौर से सुनें। अभी लोग संभलते कि फनकार ने एक शेर पेश कर दिया - वो उन्हें याद करें, जिसने भुलाया हो कभी, हमने न भुलाया, न कभी याद किया। अभी तालियों की गूंज थमी भी नहीं कि उनका दूसरा नजराना पेश हो चुका था - रोज कहता हूं भूल जाऊं उसे, रोज ये बात भूल जाता हूं। लोग वाह-वाह कर उठे और राग विहाग में शुरू हो गया उनका दादरा।
रागिनी पहाड़ी में दूसरी प्रस्तुति से पहले उनके शेर, अंदाज अपने देखते हैं आईने में वो, और ये भी देखते हैं कोई देखता नहीं... को भी श्रोताओं की ओर से खूब समर्थन मिला। तालियों की गूंज के बीच पेशकश के बोल सामने थे - दिल में इक लहर सी उठी है कि...  कुछ तो नाजुक मिजाज हैं हम भी, और ये शौक नया है भी... सो गए लोग इस हवेली के, एक खिड़की मगर खुली है भी...।
क्रीम कलर की शेरवानी और चेहरे पर गंभीर मुस्कान के साथ उन्होंने घोषणा की कि मेरी तीसरी पेशकश वह गजल है, जो खुद मुझे पसंद है और जिसे मैंने आशा भोंसले के साथ भी गाया है। बोल थे - गए दिनों का सुराग लेकर, किधर से आया, किधर गया वो...। और इसी के साथ संपन्न हो गया उनका कार्यक्रम, मगर लोग मानने को तैयार ही नहीं थे। आवाज आ रही थी, तेरे शहर में... वाला सुनाकर जाइए, तेरे शहर में वाला सुनाकर जाइए...।
(२७ अप्रैल २०१६ को वाराणसी जागरण के पहले पेज पर प्रकाशित)

Saturday, December 12, 2015

काशी में आपका स्वागत है मोदी-शिंजो

धर्म-अध्यात्म, कला-संस्कृति की परंपराप्रिय पौराणिक नगरी काशी में आपका हार्दिक स्वागत है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे। निश्चित रूप से आप दोनों का आ
मोदी-शिंजो के स्वागत में लगाए गए होर्डिंग्स। 
गमन संबंधों के स्वर्णिम इतिहास को सुनहरा भविष्य देगा। जहां मानक शिक्षा का आसमान होगा, आधारभूत संरचनाओं के विकास की पहचान होगी और होगा बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं के लिए रोजगार का नया रास्ता।
आपके आगमन की सूचना से ही कितनी बदल गई काशी। चमचमाती गलियां, रोशन रास्ते, चमकते-दमकते घाट-चौराहे, यहां का कण-कण सब आपके स्वागत को पूरी तरह तैयार हो चुके हैं। अभी 16 नवंबर की बात है। काशी और क्योटो के बीच कूड़ा प्रबंधन को लेकर होने वाला एमओयू इसलिए टल गया था कि तैयारी पूरी नहीं थी। इसके टलने के साथ ही पिछले डेढ़ वर्ष से काशी को क्योटो के समान बनाने की कवायद पर भी पानी फिरता दिखने लगा। रोज-रोज की घोषणाओं से काशीवासी भी उकता गए कि पता नहीं कुछ होगा भी या नहीं। यह भी एक राजनीतिक घोषणा ही समझ में आने लगी। उधर, लालू भी लालटेन लेकर निकलने का दावा कर रहे थे। लेकिन, आप दोनों के आगमन ने यह साबित किया कि मोदी का काशी से किया वादा केवल वादा नहीं है। बीच-बीच में होने वाले दौरों में उनके द्वारा की गई भावनात्मक टिप्पणियां महत्व रखती हैं। उनके लिए काशी के मायने हैं, यह साबित हो गया। जापानी टीम लौटी तो मोदी शिंजो को लेकर ही चले आए और शिंजो के कदम पडऩे की जानकारी होते ही पल-पल रूप बदलने लगी काशी।
मेहमान शिंजो, आप काशी की धरती पर पहली बार आ रहे हैं। जब आप यहां बाबतपुर एयरपोर्ट पर होंगे तो आपके स्वागत को तैयार होंगे प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव। स्वर लहरियां आपको यहां की संस्कृति से रूबरू कराएंगी। आपके काफिले को नदेसर कोठी के रास्ते कदम-कदम पर स्वागत करेगी बच्चों की मुस्कान। दशाश्वमेध घाट पर जब आप देख रहे होंगे विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती तो ठीक उसी वक्त वहां गुंजायमान भक्ति के सरस स्वर करेंगे दो महान संस्कृतियों का संगम।
प्रधानमंत्री शिंजो, हमें मालूम है कि बौद्ध धर्म की हमारी संस्कृति के पूरे सम्मान का नाम है जापान तो स्वतंत्रता संग्र्राम में आजाद ङ्क्षहद फौज को शाही सेना की सहायता की पहचान भी है जापान। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर किसी द्विपक्षीय विदेश यात्रा के लिए सर्वप्रथम जापान को चुनकर रिश्ते की स्वर्णिम गाथा पर मुहर लगाई है। मंदिरों की यह नगरी जापान के महत्वपूर्ण शहर क्योटो से धर्म का सीधा नाता जोड़ती है। संस्कृतियों के इस संगम का अद्भुत दृश्य देखने को काशी बेकरार है, सुरक्षा की मुकम्मल तैयारियों के साथ तैयार है। आइए, काशी में आप दोनों प्रधानमंत्री का स्वागत है...।

Monday, September 14, 2015

हिंदी बोलें, हिंदी लिखें

अभी से कर सकते शुरुआत
हिंदी को लेकर न जाने कितनी बातें हुईं, हो रही हैं। अधिनियम पर अधिनियम बने। पर, हिंदी आज भी पूर्ण राष्ट्रभाषा का दर्जा पाने को तरस रही है। जिन लोगों ने इसकी पैरोकारी की, वे ही इसे अमल में नहीं ला रहे। मौका मिला नहीं कि अंग्रेजी को ही आगे सरका रहे हैं। यह सभी सरकारी विभागों में देखा जा सकता है। शासकीय प्रयोजन की अधिकतर कागजी कार्यवाही से हिंदी गायब है। यह आज की बड़ी चिंता है। खैर, सरकार ते जब चेतेगी तब चेतेगी, हम-आप तो अभी से शुरुआत कर सकते हैं। हिंदी के कुछ आग्र्रह है, उन्हें सुनिए, गुनिए....।

हिंदी हैं हम, वतन है... 
हिंदी भाषा है, अब तक हम यही जानते हैं। संभवत: इसीलिए इसकी लड़ाई भी भाषा की पहचान दिलाने तक ही आवाज बुलंद कर सीमित हो जाती है। देखने की बात यह है कि हिंदी हमारी भाषा इसलिए है कि हम खुद हिंदी है। जरा याद कीजिए वह गीत... हिंदी है हम वतन है हिंदोस्तां हमारा...। यह समझ विकसित करनी होगी।

आदत सुधारने की बात है
आपको हस्ताक्षर करने हैं। तपाक से अंग्रेजी में कलम घिसट दी। क्यों भई, क्या हिंदी में हस्ताक्षर मान्य नहीं होते? किसी ने पता पूछा, आपने पर्ची पर अंग्रेजी में अपना पता लिखकर थमा दिया। सोचिए, क्या इसे हिंदी में नहीं लिखा जा सकता? यदि हां, तो लिखते क्यों नहीं, आदत सुधारते क्यों नहीं?

बच्चों को बताना होगा 
आजकल छोटे-छोटे बच्चे गुड मार्निंग, टाटा-टाटा, बाई-बाई करते दिख जाते हैं। जिन्हें सलीके से कदम उठाना नहीं आता, पानी मांगना नहीं आता, उन्हें भी इस तरह बोलना सिखाया जाता है। सिखाने वाले भी बस इतना ही जानते हैं। हैरत है। वे चाहें तो इसके बदले हिंदी में प्रणाम, सुप्रभात, शुभ विदा जैसे शब्दों-वाक्य विन्यासों का इस्तेमाल कर सकते हैं। बच्चों को बता सकते हैं। ध्यान रहे संस्कार बचपन से ही डाले जाते हैं।

फार्म भी भरिए हिंदी में 
रेलवे स्टेशन गए। आरक्षण का फार्म भरते हैं। विकल्प है। इसे हिंदी में भी भरा जा सकता है। आप वहां अंग्रेजीदां क्यों बन जाते हैं? क्या हिंदी नहीं आती? आती है तो इसे हिंदी में ही क्यों नहीं भरते? हिंदी का आग्र्रह है, उसे हिंदी में ही भरिए। बैंकों, डाकघरों, सरकारी कार्यालयों की किसी कागजी कार्यवाही में भी इसी अनुशासन का पालन किया जा सकता है, कीजिए। अबकी हिंदी दिवस पर यह संकल्प लीजिए, शुरुआत तो कीजिए ही...।

(हिंदी दिवस पर हिंदी को समर्पित दैनिक जागरण के १४ सितंबर २०१५ के अंक में प्रकाशित मेरा आलेख) 

Friday, July 31, 2015

चलिए प्रेमचंद के गांव लमही

लमही में कथा सम्राट प्रेमचंद के घर के सामने।
जिन्होंने साहित्य को दिशा दी, दलितों को आकाश। जिन्होंने लेखन को शैली दी, विचार को धाराएं। जिन्होंने हर वर्ग के लिए कलम चलाई और जो 'मानसरोवरÓ के सात भागों में छपीं। जिन्होंने 'हंसÓ को उड़ान दी, भाषा को नवजीवन। जिन्होंने दरिया ए गंगा के किनारे हिलाल की शक्ल में आबाद काशी को दिलफरेब वाला मंजर बताया। उन्हीं प्रेमचंद का गांव है लमही। आपके मन में भाषा की सहजता, साहित्य के उदात्म चरित्र के प्रति सामान्य जज्बा भी जीवित होगा तो इस गांव की मिट्टी को चंदन समझकर माथे से लगा लेंगे। रोज नहीं तो 31 जुलाई (जयंती) और 8 अक्टूबर (पुण्यतिथि) को तो अवश्य ही। अफसोस! यहां इन अवसरों पर जाने के लिए आपको बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। आइए, आपको साहित्य के इस महान तीर्थ लमही तक लें चलें।
लमही में कथा सम्राट प्रेमचंद के स्मारक के पीछे।
अगर आप उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से या बिहार की राजधानी पटना से आना चाहते हैं तो आपको ट्रेन या बस से आना होगा वाराणसी स्टेशन या कैंट रोडवेज। यहां से महज आठ किलोमीटर पर है लमही। यात्रा टुकड़ों में होगी। नहीं मिलेगी कोई सीधी सवारी, चमचमाती सड़क। एक आटो से पहले जाना होगा पांडेयपुर चौराहा, फिर दूसरे से पहुंचिएगा लमही। सीधे जाना चाहते हैं तो पूरा आटो करना होगा। फिर शुरू होगा सफर। सफर कि ईश्वर याद आ जाएं।
पांडेयपुर चौराहे तक तो जाम के झाम में उफ-आह कर पहुंच जाएंगे। इसके बाद लगेगा ही नहीं कि किसी शहर की सड़क पर स्वच्छ वातावरण में किसी साहित्यकार की धरती तक जाने के रास्तेे पर हैं। सड़कों के बड़े-बड़े गड्ढे और उन पर छाए धूल के गुबार से बच गए तो कुछ दूर सड़क के दोनों किनारे आपको जीर्ण-शीर्ण और उजड़े चमन का नजारा 'विकासÓ की पटकथा लिखता नजर आएगा। इस दौरान भूल से भी किसी ऐसे शिलापट्ट की कल्पना मत कीजिएगा, जिस पर यह लिखा मिले कि रास्ता महान कलमकार के गांव तक जाता है। पांडेयपुर चौराहे पर लगी है प्रेमचंद की मूर्ति। ताज्जुब हुआ कि मूर्ति भी आने वालों को नहीं दिखती। एक तो यह पता ही नहीं चलता कि ओवरब्रिज के नीचे जाम के झाम में गोल घेरा है क्या। दूसरे मूर्ति उस पार लगी है और लमही से लौटने वालों को ही दिखती है।
इतिहास को खंगालने वाले जानते हैं कि साहित्य सृजन के प्रति प्रेमचंद का लगाव कितना गहरा था। समय- काल और परिस्थितियों से उनकी कलम सीधी टक्कर लेती थी। जिस चरित्र को उन्होंने बरसों पहले कथाओं में सहेजा, वे आज भी घूमते नजर आते हैं। 'सोजे वतनÓ देश प्रेम के प्रति जज्बा जगाने वाली उनकी वह कृति थी, जिसे ठीक उसी तरह प्रतिबंधित किया गया, जैसे आजादी के दीवानों को फांसी पर चढ़ा दिया जाता था। प्रेमचंद की धर्मपत्नी शिवरानी देवी ने 'प्रेमचंद घर मेंÓ में कथा सम्राट से संबंधित जिन घरेलू बातों की चर्चा की है, उनमें हंस का प्रकाशन होता रहे, इसके प्रति उनकी समर्पण भावना का अनूठा चरित्र सामने आता है।
घटनाएं बानगी हैं। प्रेमचंद का पोर-पोर देश प्रेम, समाज के उत्थान और साहित्य सृजन से जुड़ा है। किसी बच्चे से किसी साहित्यकार का नाम पूछ लीजिए, उसकी जुबान पर सबसे पहले आता है प्रेमचंद। उनके साहित्य और सृजनशीलता का आनंद लेने वालों का भी पोर-पोर इनका ऋणी होना चाहिए। और कुछ नहीं तो इतना तो होना ही चाहिए कि वाराणसी और यहां तक आने सभी स्टेशनों-बस अड्डों पर लिखा मिले कि यहां से उतरकर आप प्रेमचंद की मिट्टी को प्रणाम करने जा सकते हैं। मान लेते हैं कि किन्हीं कारणों से इन स्थानों पर सूचना पट्ट नजर नहीं आते, लेकिन वाराणसी में तो यह नजर आना ही चाहिए था। आप स्टेशन या रोडवेज से लमही की ओर जाते रास्तेे में इस सूचना को तलाशेंगे तो आंखें तरसती रहेंगी।
और हां, इस रास्ते पर बढ़ते सीधा मत देखते चलिए। लमही छूट जाएगी, आप आगे निकल जाएंगे। मुख्य सड़क से जो रास्ता फूटा है, उस ओर ही लमही का संकेत मिलेगा। बहरहाल, इन सब बातों से हमारे-आपके ऊपर तो फर्क पड़ता है, लमही पर नहीं। यह मिट्टी तो साहित्य का चंदन है। इसे माथे पर लगाइए।
(दैनिक जागरण के वाराणसी संस्करण में ३१ जुलाई को पेज वन पर प्रकाशित)

...तो प्रेमचंद से ऐसे जुड़ गया 'मुंशी'
प्रेमचंद अध्यापक रहे, कायस्थ भी थे। तब अध्यापकों को मुंशी जी कहा जाता था, कायस्थों के नाम के पहले भी सम्मान स्वरूप मुंशी लगाने की परंपरा रही है। लोगों को लगता है, इसीलिए प्रेमचंद हो गए मुंशी प्रेमचंद। लेकिन, यह पूरा सच नहीं है।
प्रेमचंद के सुपुत्र एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार अमृत राय ने एक पत्र में उल्लेख किया है, प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे मुंशी शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। हालांकि, उनका यह भी मानना है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है, जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने कभी लगा दिया होगा।
इस संबंध में प्रेमचंद की धर्मपत्नी शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक 'प्रेमचंद घर मेंÓ में प्रेमचंद से संबंधित सभी घरेलू बातों की चर्चा की है, पर कहीं भी उनके लिए मुंशी का प्रयोग नहीं हुआ है। हालांकि, शिवरानी देवी ने इसी पुस्तक में दया नारायण जी के लिए मुंशी जी शब्द का प्रयोग कई बार किया है।
प्रेमचंद के नाम, जो प्रकाशकों ने उनकी कृतियों पर छापे हैं, उनमें क्रमश: श्री प्रेमचंद जी (मानसरोवर प्रथम भाग), श्रीयुत प्रेमचंद (सप्त सरोज), उपन्यास सम्राट प्रेमचंद धनपतराय (शिलालेख), प्रेमचंद (रंगभूमि), श्रीमान प्रेमचंद जी (निर्मला) आदि कृतियों पर भी कहीं भी मुंशी का प्रयोग नहीं हुआ है।
तो कैसे जुड़ा प्रेमचंद के नाम के साथ मुंशी विशेषण? एकमात्र कारण जो दिखता है, वह यही है कि हंस नामक पत्र प्रेमचंद एवं कन्हैयालाल मुंशी के सह संपादन मे निकलता था। इसकी कुछ प्रतियों पर कन्हैयालाल मुंशी का पूरा नाम न छपकर मात्र मुंशी छपा रहता था, साथ ही प्रेमचंद का नाम इस प्रकार छपा होता था -  
संपादक
मुंशी, प्रेमचंद।
समझा जाता है कालांतर में पाठकों ने मुंशी तथा प्रेमचंद को एक समझ लिया और प्रेमचंद, मुंशी प्रेमचंद बन गए। अब तो प्रेमचंद के साथ मुंशी शब्द इतना गहरा जुड़ गया है कि सिर्फ मुंशी से ही प्रेमचंद का बोध हो जाता है। यह सहज भी लगता है। प्रेमचंद का शिक्षक व कायस्थ होना बाद में उनके नाम के आगे के मुंशी को मजबूत करता चला गया...।

Sunday, March 1, 2015

Dr.Mamta Sharan: साल भर के महत्वपूर्ण दिवस

Dr.Mamta Sharan: साल भर के महत्वपूर्ण दिवस: जनवरी महीनेँ के महत्वपूर्ण दिवस 1 जनवरी = सेना चिकित्सा कोर स्थापना दिवस, नया साल दिवस, विश्व शांति दिवस, विश्व परिवार दिवस...