Monday, November 9, 2009

सब जज्बे की बात

व्यक्तित्व विकास पर चल रही सीरीज का यह पचासवां आलेख है। मेरे लिए तो यह बस एक आश्चर्य की ही बात है कि मैंने एक ख्याल पर्सनालिटी डेवलपमेंट पर उनचास लेख लिख दिए और पचासवां लिखने जा रहा हूं! क्या लिखूं यह सवाल नहीं है, न ही यह सवाल है कि कैसे लिखूं? सवाल यह है कि कुछ और अच्छा लिखूं, उनचासों से अच्छा। तो इसके पहले कि मैं इस हाफ सेंचुरी पर बातें आगे बढ़ाऊं, यह जरूरी है कि इन आलेखों को पढ़ने वालों और इन्हें लिखने के लिए प्रेरित करने वाले सभी हमकदम, हमख्यालों को बधाई दे लूं। आप सभी मेरी शुभकामनाएं कबूल करें।

व्यक्तित्व विकास पर कुछ अच्छा लिखने के लिए सोचों की जेरेसाया जो एक शब्द मेरे जेहन में गूंजा, वह शब्द था - जज्बा। मुझे लगता है कि व्यक्तित्व विकास के प्रति सतर्क व्यक्ति जो भविष्य संवारने के लिए भी संवेदनशील हों, उनके लिए इस शब्द का बड़ा महत्व है। आपका जज्बा आपको आपके हर कदम पर ऊंचा उठाता है, नीचे गिराता है। चाहे पूज्य बापू महात्मा गांधी हों, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू हों, डा. राजेन्द्र प्रसाद हों या फिर इंदिरा, पटेल जेपी ही हों। टाटा, बिड़ला की ही बात कर लें। उनकी मिसालें इसलिए आज धरोहर हैं कि वे एक जज्बा रखने वाले लोग थे। अपने जज्बों के प्रति निष्ठा भाव से समर्पित रहने वाले लोग थे।

मेरे एक साथी हैं। उन्हें एक महत्वपूर्ण पद पर विराजमान कर दिया गया। कोई भी पद महत्वपूर्ण इसलिए ही होता है कि वहां का काम महत्वपूर्ण होता है। हां, उस महत्वपूर्ण पद पर विराजमान व्यक्ति के सामने कुछ ऐशपरस्ती के भी मौके भी जरूर होते हैं। मगर, ऐशपरस्ती के मौके पद की महत्ता को बढ़ाने के लिए होते हैं, न कि उसमें डूबकर पद की महत्ता को भूल जाने के लिए। जज्बे का यहीं महत्वपूर्ण रोल हो जाता है। काम के प्रति आपका जज्बा बना रहा तो पद पर आपके बने रहने की संभावना बनी रहेगी और इसी के साथ बनी रहेगी उस पद से जुड़ी रहने वाली ऐशपरस्ती।

अब साथी ऐशपरस्ती में डूब गए। काम का दिन-ब-दिन कबाड़ा निकलने लगा। एक महीना बीता, दो महीना बीता। तीसरे महीने तो जिन्होंने उन्हें उस कुर्सी पर बिठाया था, उन्होंने ही टिप्पणी शुरू कर दी। साथी टिप्पणी झेल रहे थे और इधर-उधर प्रति टिप्पणी करते चल रहे थे। अब एक समय ऐसा आया कि बॉस बदल गया। साथी की ऐशपरस्ती चलती रही। जब उनसे काम खोजा जाने लगा तो वे घबरा गए। उनका घबराना यह बताता था कि काम के प्रति उनका जज्बा खत्म हो चुका था। नतीजा, उन्हें पद से भी पहले ऐशपरस्ती खोनी पड़ी। बाद में तो वे पद बचाने के लिए मशक्कत कर रहे थे। यह मशक्कत संस्थान बदलने के बाद ही पूरी हुई। एक ख्वाब जो ख्वाबों में ऊंचा मुकाम चढ़ गया था, अंजाम तक पहुंचने से ही पहले ध्वस्त हो गया। कारण रहा जज्बे की कमी।

फिलहाल इतना ही। व्यक्तित्व विकास के प्रति सतर्क व्यक्ति के लिए भविष्य संवारने काटिप्स तलाशती रपटों का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।

सर्वाधिक पत्थर उसी पेड़ पर फेंके जाते हैं, जो फलों से लदे होते हैं।

Monday, November 2, 2009

सालम आदमी को बेच देता है वह आदमी

नजीर के कलाम 'यां आदमी पे जान को वारे है आदमी और आदमी पे तेग को मारे है आदमी...’ की तरह ही तो दिखता है वह। आता है, चाय-नाश्ता-भोजन करता है, इंसानियत के रिश्ते गांठता है, चकाचौंध व ग्लैमर भरी जिंदगी के सपने दिखाता है और आखिर में सालम आदमी को बेच देता है वह आदमी। हथियार-नशीली दवाओं के बाद विश्व के दूसरे बड़े संगठित अपराध 'मानव व्यापार’ का बरास्ते नेपाल बार्डर इतना ही तो सच है। अपना बनाकर दामन में दाग लगाने वाला और इंसानी जेहन में सन्नाटा मचा देने वाला यह खेल उत्तर बिहार से जुड़ी खुली नेपाल सीमा के कदम-कदम पर हर रोज खेला जाता है। गोरखपुर से शुरू होकर वाल्मीकिनगर, रक्सौल, सोनबरसा, भिïट्टामोड़, बैरगनिया, पूर्णिया, सुपौल से लेकर पश्चिम बंगाल तक।
पश्चिमी चंपारण में 26 अप्रैल 2008 को सीमावर्ती वाल्मीकिनगर थाना क्षेत्र होकर बार्डर पार कराने के दौरान पकड़ी गयी सात नेपाली लड़कियों ने जो बताया और उससे क्रास बार्डर ट्रैफिकिंग की जो कहानी सामने आयी, वह किसी भी संवदेनशील इंसान के मानस पटल को झकझोर कर रख देने वाली है। कभी लड़की के जन्म पर लक्ष्मी का आना मानकर खुशियां मनाने और जश्न में डूब जाने वाला गरीब नेपाली समुदाय आज पूरी तरह ग्लैमर की चकाचौंध में फंस गया है। नेपाल सरकार परेशान रहे तो रहे, भारत हाय-तोबा मचाता रहे तो रहे, विश्व भर में जहां-तहां राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में चिंता प्रदर्शन का दौर जारी रहे तो रहे, पर यह सच है कि तराई के करीब आधा दर्जन से अधिक जिलों सरलाही, वारा, परसा, नवलपरासी, मकवानपुर, सिंधुली और थरुहट इलाके में 'मानव व्यापार’ को किसी अपराध के नजरिये से बिल्कुल नहीं देखा जाता। हां, यह रोटी के जुगाड़ का आसान मार्ग जरूर है। जिसे आम दुनिया सिंडिकेट, रैकेट और नेक्सस के रूप में जानती है, उसे यहां का बड़ा हिस्सा रोजगार मुहैया कराने वाला मानता है। जी हां, पूरा सौदा तय होता है। परिवार के अभिभावक को एक साल का मेहनताना एडवांस दिया जाता है। कम से कम पच्चीस सौ रुपये प्रतिमाह की तय राशि पर एक युवती घर से निकल पड़ती है पैसे कमाने के सपने को पूरा करने। पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकिनगर, पूर्वी चंपारण के रक्सौल, सीतामढ़ी के बैरगनिया और मधुबनी के जयनगर में कहीं भी नेपाल बार्डर पर जब वे पकड़ी जाती हैं तो यह साबित करना ही मुश्किल होता है कि वे किसी साजिश का शिकार हैं। साथ चलने वाले लड़के को वे अपना रिश्तेदार बताती हैं, जबकि लड़का भी कुछ ऐसी ही बातें करता रहता है। कड़ी मशक्कत के बाद पुलिस और सुरक्षा अधिकारियों के हाथ तो कुछ नहीं आता। जब वे उन लड़कियों को वापस उनके परिजनों के हवाले करते हैं तो उनमें लौटकर घर आने या किसी बड़ी मुसीबत से बच जाने की भी कोई खुशी नहीं दिखती।
खुले नेपाल बार्डर से मानव व्यापार का यह धंधा कब से शुरू है, यह कहना तो मुश्किल है, पर 2004 से मानव व्यापार पर रोक लगाने के लिए दो बड़े एनजीओ नेपाल में माइती नेपाल और भारत में दलित महिला उत्थान केन्द्र मानव सेवा संस्थान (सीबीटीएन) के वजूद में आने और सक्रिय होने के बाद इस पर अंकुश लगा है। इनके प्रतिनिधि सीमा पर खासकर रक्सौल में चौबीसों घंटे नजर रखते हैं। ट्रैफिकिंग के अधिकतर मामले रक्सौल में ही पकड़े जाते हैं। सीबीटीएन के मेंबर जब तक एक-एक बोगी को खंगाल नहीं लेते, तब तक रक्सौल से बड़े शहरों को जाने वाली लंबी दूरी की कोई ट्रेन नहीं खुलती। हालांकि, सिंडिकेट से जुड़े लोगों ने इससे पार पाने का भी रास्ता ढूंढ़ लिया है। अब वे 'खेप’ के साथ पैदल सीमा पार करते हैं, तांगा से भारत में भीतर घूम-फिरकर बस पकड़ते हैं और फिर रेलमार्ग से आगे निकल जाते हैं। महानगरों खासकर दिल्ली पहुंचने के बाद ही खेप सिंडिकेट के असली हाथों में जाती है।
आंकड़ा कहता है कि 9 से 16 वर्ष की सात हजार से दस हजार लड़कियां प्रतिवर्ष नेपाल से भारत भेजी जाती हैं, जो विभिन्न शहरों की सेक्स मंडियों से लेकर खाड़ी देशों तक में खपायी जाती हैं। एक अनुमान के अनुसार भारतीय सेक्स ट्रेड में इस वक्त करीब दो लाख नेपाली लड़कियां इस्तेमाल हो रही हैं या की जा रही हैं। 2006 में भारत में महिलाओं व बच्चों की तस्करी पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि नेपाल से आने वाली महिलाओं में से सर्वाधिक 42 फीसदी उत्तर प्रदेश व 40 फीसदी दिल्ली पहुंचती हैं। इसके अलावा नौ फीसदी महाराष्ट्र, पांच फीसदी पश्चिम बंगाल व चार फीसदी बिहार ले जायी जाती हैं।
नेपाल सीमा से चलाये जा रहे इस खेल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सिंडिकेट से सीधा जुड़ा कोई 'मुर्गा’ कभी पकड़ में नहीं आया। वाल्मीकिनगर में पकड़ी गयी लड़कियों की शिनाख्त पर पूर्वी चंपारण के एक कारोबारी का नाम सामने आया था, पर वह भी एक लंबा समय गुजर जाने के बावजूद शिकंजे से दूर ही है। पुलिस की आंखों में धूल झोंककर बदस्तूर जारी इस धंधे का सच यह है कि ट्रेनरों के हाथों कभी-कभी शिफ्टिंग की जिम्मेदारी मिल जाने से ही लड़कियों की खेप बार्डर पर पकड़ी जाती है। नेपाल ने अभी हाल में ही 4 मार्च 2009 को मानव व्यापार के खिलाफ बड़ी लड़ाई की घोषणा की है। उधर, भारत में भी इसको लेकर समय-समय पर सरगोशियां चलती रहती हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग ने अपनी रिपोर्ट में मानव व्यापार को अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद माना है। जब कभी मामला उठा, कार्ययोजना का शीघ्र प्रारूप तैयार करने का वादा कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली गयी। 8 नवंबर 2007 को पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यूनाइटेड नेशंस आफिस आन ड्रग्स ऐंड क्राइम के संयुक्त सहयोग से पटना, गया और मुजफ्फरपुर में तीन मानव व्यापार निरोध कोषांग का गठन किया। 3 फरवरी 2008 को तत्कालीन एडीजी सीआईडी अशोक कुमार गुप्ता जब मुजफ्फरपुर आये तो उन्होंने स्वीकारा कि नेपाल के रास्ते हो रही मानव तस्करी बेलगाम हो गयी है और इस पर काबू पाना जरूरी है। पर, बंद कमरे की ये बातें कभी बार्डर की राह नहीं पकड़ पायीं। खुली सीमा आज भी मानव व्यापार का प्रवेश मार्ग बनी है। 21 नवंबर 2008 को सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के आईजी दिलीप टंडन ने नेपाल सीमा पर 750 महिला आरक्षियों की तैनाती की घोषणा की तो मानव व्यापार पर कुछ अंकुश लगने की उम्मीद जगी। हालांकि, 1800 किलोमीटर लंबी खुली नेपाल सीमा पर इससे कितना अंकुश लग पायेगा, कहना मुश्किल है। फिलहाल शिकारी कौन, शिकार कौन की मुश्किल पहचान के बीच सिलसिला कुछ यूं बना है - एक सन्नाटा मेरी पलकों पे लिखता है धुआं, जैसे एक कंदील के साये में हों तारीकियां, ठीक है कि स्वप्न मेरे टूट ही जायेंगे फिर, है इन्हीं सपनों में एक उम्मीद की महफिल जवां।

...पर सरगना कभी नहीं हुआ चिह्नित
पिछले एक साल में सिर्फ रक्सौल रेलवे स्टेशन परिक्षेत्र से करीब पांच सौ से अधिक युवतियों व गिरोह के लोगों को हिरासत में लिया गया। इस दौरान गिरोह के लोगों के पास से विदेशी मुद्रा व पासपोर्ट तक बरामद किये गये, पर स्थानीय या नेपाल प्रशासन इस कार्य में लगे सरगनाओं को चिह्नित करने में विफल साबित हुए। मानव तस्करी रोकने की दिशा में प्रयासरत स्वयंसेवी संगठन सीबीटीएन व प्रयास के सर्वे में यह खुलासा हुआ कि इस कार्य में लगे लोग युवक-युवतियों को अपना रिश्तेदार बताकर रक्सौल के रास्ते दिल्ली, मुंबई, कोलकाता व खाड़ी देशों में ले जाते हैं और मोटी रकम लेकर उन्हें देह व्यापार मंडी, रेस्तरां, बार व होटलों में शारीरिक शोषण के लिए झोंक देते हैं।

छितौनी का रेल सह सड़क पुल वरदान
गोरखपुर से सटे पश्चिमी चंपारण के बगहा पुलिस जिले में स्थित गंडक नदी पर छितौनी के समीप बने रेल सह सड़क पुल तस्करों के लिए वरदान बना हुआ है। सीतामढ़ी जिले के सोनबरसा, भिट्ठामोड़ व बैरगनिया की खुली सीमाएं मानव तस्करी के लिए तो बदनाम हैं ही, जिले के भीतर भी लड़कियों, महिलाओं व बच्चों को जाल में फांसा जा रहा है। सीतामढ़ी में पांच वर्षों के दौरान ट्रैफिकिंग से जुड़े करीब डेढ़ सौ से अधिक मामलों का खुलासा हुआ। यह भी सामने आया है कि युवतियों को पहले येन-केन प्रकारेण मुजफ्फरपुर भेजा जाता है, जहां से उन्हें आगे के गिरोहों के हवाले किया जाता है।

Tuesday, October 20, 2009

लत, संगत, पंगत

चाहने वालों का आग्रह था, थोड़ा जल्दी-जल्दी लिखूं, कम समय अंतराल पर लिखूं। पर, देख लीजिए, इच्छा के बाद भी विलंब हुआ। क्यों हुआ, इस पर विचार करने बैठा तो जो तीन चीजें छनकर आईं, उससे भविष्य को संवारने का ही सूत्र मिलता है। ये तीन चीजें हैं लत, संगत और पंगत। जी हां, इन तीन चीजों से भविष्य और भविष्य की कार्ययोजना बुरी तरह प्रभावित होती हैं, कमोबेश इसे सभी जानते हैं, पर कितनी बुरी तरह प्रभावित होती हैं, आइए मैं भी बताने की कोशिश करता हूं।

सबसे पहले लत। बुरी लतें भविष्य खराब कर देती हैं, यह तो सभी मानते हैं, पर कभी-कभी अच्छी लतें भी भविष्य चौपट कर सकती हैं, यह मैं कहना चाहता हूं। मान लेते हैं, एक व्यक्ति पढ़ाकू है। खूब पढ़ता है। इस पढ़ने की वजह से उसके पास ज्ञान का भंडार है। अब देखिए, इस भंडार से वह किसी बेहतर औऱ कमाऊ जगह पर पहुंच गया, पर लत वहां भी उसका पीछा नहीं छोड़ रही। अब वह दफ्तर में किताबें लिए पहुंच रहा है। पूरा दफ्तर परेशान। वह मानने को तैयार नहीं। बास का आखिरी अल्टीमेटम और उसमें नाराजगी, आक्रोश का भंडार। इसके पहले कि बास कोई फैसला ले, उसने खुद फैसला ले लिया। तो मेरा मानना है कि अपनी आदतों पर नजर रखिए और उसके किसी हिस्से में किसी चीज की लत का पता चले तो तत्काल उसे निकालिए, भविष्य संवरेगा।

दूसरी बात संगत। यानी संगति। यह कौन नहीं जानता - संगत से गुन होत हैं संगत से गुन जात...। एक गांव के एक पंडित जी का किस्सा सुनाऊं। पंडित जी पूजा-पाठ, शादी-विवाह सब कराते हैं। बड़ा नाम था, बड़ी इज्जत थी। गांव में ही एक अपराधी भी था। वे उसके यहां भी पूजा-पाठ कराते थे। वहां से उन्हें चढ़ावा कुछ ज्यादा मिलने लगा, नतीजा उनका ज्यादातर समय उसी अपराधी के दरवाजे पर गुजरने लगा। अब अपराधी जेल गया तो वे यदा-कदा जेल गेट पर भी दिखने लगे। पांच-सात वर्षों के बाद का आलम यह है कि अगल-बगल के गांवों के लोग उन्हें पंडित कम अपराधी का माऊथपीस ज्यादा मानने लगे हैं। पंडित जी परेशान हैं। पुलिस वाले भी यदा-कदा उन्हें खोजते नजर आते हैं और वे पुलिस से बचते। परेशान पंडित जी एक दिन मुझसे मुक्ति का मार्ग पूछ रहे थे, मैं सिर्फ इतना ही कह पाया - सब संगत का असर है पंडित जी और पंडित जी लाजवाब।

तीसरी बात पंगत। पंगत का मतलब होता है भोजन, खाना, ब्रेकफास्ट, डिनर, लंच। फौज के कंटीनों में कहीं पढ़ा था- इट फार हेल्थ नाट फार टेस्ट। जब पढ़ा था, तब बहुत देर तक मजाक उड़ाता रहा था। मगर, कितना सही था वह वाक्य! मेरे यहां एक देहाती कहावत कहते हैं - जैसा अन्न खाओगे, वैसा ही बनोगे। इसे ऐसे बताऊं। पंगत दो कारणों से लगानी पड़ती है। पहला, जीवन जीने के लिए। भूख और उपवास के बाद बुद्ध ने भी स्वीकार किया कि यह प्रकृति के विरुद्ध है। आपको देह नष्ट करने का अधिकार नहीं है। सो, भोजन जरूरी है। दूसरा, हम कभी भी और कुछ भी नहीं खा सकते। स्वास्थ्य बिगड़ेगा तो निश्चित रूप से भविष्य के कार्यक्रम भी बिगड़ेंगे। फिलहाल इतना ही। व्यक्तित्व विकास को सतर्क व्यक्ति के लिए भविष्य संवारने वाले टिप्स खोजती चर्चाओं का सिलसिला अभी जारी रहेगा।

कुछ वादे ऐसे होते हैं, जो कभी तोड़े नहीं जाते। कुछ यादें ऐसी होती हैं, जो कभी लिखी नहीं जातीं। यदि आप सच्चे रिश्ते के जादू को महसूस कर सकें तो जान जाएंगे कि कुछ शब्द ऐसे भी होते हैं, जो कभी बोले नहीं जाते।

Thursday, October 1, 2009

फैलता-सिकुड़ता भविष्य

वक्त के दायरे में चाहे भविष्य ही क्यों न हो, जब फंसता है तो फैलता भी है और सिकुड़ता भी है। कैसे? दिल्ली जाने के लिए किसी ने बस पकड़ी, किसी ने ट्रेन तो कोई हवाई जहाज पर ही उड़ चला। तीन व्यक्ति का एक भविष्य दिल्ली पहुंचना वक्त के दायरे में कैसे फैला और कैसे सिकुड़ा, अब क्या यह समझाने की बात है? नहीं न?

मगर, यह समझने की बात है कि यदि दिल्ली जाना ही तीनों व्यक्तियों का लक्ष्य था तो कोई जरूरी नहीं कि पहले पहुंचने वाला व्यक्ति ही सब कुछ हासिल कर ले और पीछे पहुंचने वाला व्यक्ति कुछ भी हासिल न कर पाए। इसके बिल्कुल उलट भी हो सकता है।

कैसे? हवाई जहाज से उड़ने वाले के लिए अपना सब कुछ तलाशने का मौका सिर्फ दिल्ली में मिलने वाला है। जहां से उड़ा, वहां के बाद संभावनाओं का विकल्प उसके लिए सिर्फ दिल्ली में खुलता है। बीच के सारे स्टापेज से वह चूक जाता है। बस-ट्रेन से सफर करने वालों के साथ ऐसा नहीं है। रास्ते के सारे एवेन्यू के मजे लेने के उसके पास जो मौके हैं, वह उड़ान भरने वालों के पास कहां?

इन बातों का अर्थ क्या हुआ? अर्थ वही कछुआ और खरगोश वाला है। स्लो व स्टीडी विन्स द रेस वाला है। हवाई जहाज से उड़कर जल्दी पहुंच गए, मगर लगे सुस्ताने, लगे आराम फरमाने तो चूक जाएंगे।जल्दी पहुंचकर भी पीछे छूट जाएंगे। छूट जाएंगे कि नहीं?

आइए अब उन बातों पर चर्चा करें, जो बातों-बातों में सामने आयी है। क्या? कि सवाल माध्यम का नहीं, लक्ष्य का है। कि सवाल जल्दबाजी का नहीं, टाइम मैनेजमेंट का है। कि सवाल गति का नहीं, उसकी निरंतरता का है। कि सवाल बौखलाहट व बेचैनी का नहीं, धैर्य व गंभीरता का है।

यानी, माध्यम कोई भी हो आपका लक्ष्य हमेशा आपके सामने रहना चाहिए और आपका काम उसी दिशा में होना चाहिए। किसी काम को पूरा करने की न तो जल्दबाजी दिखाएं, न छोटे-छोटे कारणों से गति में शिथिलता लाएं। आपको इसके लिए बस समय प्रबंधन की कला सीखनी होगी। टाइम का नहीं, टाइम मैनेजमेंट का ख्याल करना होगा। बौखलाहट और बेचैनी की तो कोई बात नहीं, जो जल्दबाजी नहीं दिखाएगा, जो टाइम मैनेजमेंट के फैक्टर पर अमल करेगा, उसमें अपने आप धीरता और गंभीरता आ ही जाती है।

और इतना सब कुछ आपने किया तो निश्चित मानिए, आपका भविष्य संवरा। फिलहाल इतना ही। व्यक्तित्व विकास को सतर्क व्यक्ति के लिए भविष्य संवारने वाले टिप्स खोजती चर्चाओं का सिलसिला अभी जारी रहेगा।


इलाहाबाद से सतीश चंद्र श्रीवास्तव का एसएमएस - जब बाढ़ आती है तो चीटियों को मछलियां खा जाती हैं। पानी उतरने पर मछलियों को चींटियां खाने लगती है। सबक - अवसर सभी के सामने आते हैं।

Saturday, September 26, 2009

आप सभी को दशहरे की बधाई


यह भी याद करें,

यह भी फरियाद करें।

कि मिलता रहे

हमें, हम सबको,

सदा, सदा और हमेशा।

मां का प्यार... ,

बहन का प्यार... ,

कभी-कभी दुल्हन का भी प्यार... ।

Friday, September 25, 2009

फेट, ट्रस्ट, होप

मुझे याद आता है दुष्यंत की रचना का एक टुकड़ा। मैं बेपनाह अंधेरे को सुबह कैसे कहूं, मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं .....। कविता किसी दूसरे अर्थ में लिखी गयी है, पर मुझे इसका जो मतलब समझ में आता है, उसका नजारा कराना चाहूंगा। नजारों की नजर यह है कि जो कुछ भी सामने दृष्टिगोचर है, कम से कम उस पर तो पूरी नजर फेर ही ली जाए। अंधेरा है तो अंधेरा कहिए, सुबह है तो सुबह। अंधेरे को सुबह कहने-समझने में खतरे ही खतरे हैं।

तीन दृष्टांत हैं, तीन तरह की घटनाएं। ये सभी के सामने घटती रहती हैं, पर शायद ही कभी किसी ने इसकी गहराई थामने की कोशिश की हो। आइए, कम से कम मौके और दस्तूर का लिहाज करते हुए अब इसकी गहराई नाप ली जाए। मेरा मानना है कि एक बार इन घटनाओं के जेरेसाया हकीकत और फसाने को ठीक-ठीक समझ गए तो संवर गया भविष्य, सुधर गया कल। वह कल जो कभी आता ही नहीं है। जब आता है तब आज बन जाता है। ये तीन बातें है फेट, ट्रस्ट और होप।

दृष्टांत एक - एक गांव में वहां के लोगों ने बारिश के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने का समय निश्चित किया। तय समय पर सारे लोग वहां प्रार्थना के लिए आए। पर, सभी खाली हाथ थे। खाली हाथ यानी प्रार्थना के लिए हाथ जोड़ेंगे और काम मुकम्मल। पर, वहां एक ऐसा बच्चा भी आया, जिसके हाथों में छाता था। उसे भवितव्यता पर भरोसा था कि हमारे कृत्य यदि बारिश के लिए किए जा रहे हैं तो बारिश होगी। और यदि बारिश होगी तो भींगने से बचने के लिए उसके पास छाता था। यह क्या था। यह था फेट का नमूना।

दृष्टांत दो - एक बच्चे को आप आकाश में उछालते हैं। उसे तो अपनी मौत के भय से थर-थर कांपना चाहिए। पर नहीं, वह हंसता है, किलकारियां मारता है, चहकता है। उसे भरोसा है कि आप उसे गिरने नहीं देंगे, आप उसे मरने नहीं देंगे। क्या है यह? यह है ट्रस्ट।

दृष्टांत तीन - हर रात आप सोने जाते है। सोते भी हैं और सोने से पहले आप कल का पूरा मेनू तैयार कर लेते हैं। एक-एक मिनट तक का। यह करेंगे, वह करेंगे। यहां जाएंगे, वहां जाएंगे। कोई कभी यह नहीं सोचता कि अरे अभी सोया, कल जगेंगे कि नहीं पता नहीं। पर नहीं, आप या कोई ऐसा नहीं सोचता। क्या है यह? यह होप है।

फेट, ट्रस्ट, होप के बहुत सारे उदाहरण हो सकते हैं, पर समझने की बात यह है कि भविष्य संवारने के लिए चेतनशील व्यक्ति में इन तीन चीजों का होना मुझे जरूरी लगता है। आपमें किसी काम के शुरू करने से पहले छाता लेकर चलने वाला फेट होना चाहिए, अपने इर्द-गिर्द के माहौल-परिवेश से कुछ लम्हों- कुछ लोगों पर आपका ट्रस्ट होना चाहिए और एक बार सो गए तो फिर जगेंगे, ऐसा होप होना चाहिए। होना चाहिए कि नहीं? फिलहाल इतना ही। व्यक्तित्व विकास को लेकर भविष्य संवारने के लिए टिप्स तलाशती चर्चाओं का सिलसिला अभी जारी रहेगा।

इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है, नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है। एक चिनगारी कही से ढूंढ़ लाओ दोस्तों, इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है। एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी, आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है। एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी, यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है। निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी, पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है। दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर, और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है। - दुष्यंत

Wednesday, September 23, 2009

मैं तूफान में भी चैन से सोता हूं....

आप कुछ कर रहे हैं औऱ आपका कलेजा कांप रहा है। क्या है इसका मतलब? मतलब साफ है कि कुछ न कुछ गलत है, कहीं न कहीं कमजोरी है। आप बोल रहे हैं और आपकी जुबां लड़खड़ा रही है। मतलब, या तो बोलना नहीं आता या जो बोल रहे हैं उसकी आपने तैयारी नहीं की है। जिंदगी के मुकाम पर जब आपकी उम्र बढ़ती जाती है तो आप भविष्य के गर्भ में तो प्रवेश करते जाते हैं, पर इसके साथ ही आप अतीत भी बनते जाते हैं। बीए की कक्षा का विद्यार्थी मनोहर पोथी नहीं पढ़ सकता। यदि पढ़ता है तो गलत है। जिन बाल - बच्चों के लिए आपका जीवन आदर्श बनना चाहिए, उनके सामने भी आप फ्रेशर्स बने रहेंगे तो माना जाएगा कि आपने जिस रास्ते पर अपनी जिंदगी को घसीटा है, वह गलत था। दिल्ली की ओर जाने वाले यदि सही रास्ते पर आगे बढ़ें तो वे दिल्ली ही पहुंचेंगे। रास्ता गलत होगा तो वे कहां पहुंच जाएंगे कहा नहीं जा सकता।

संदर्भ भविष्य का है और बात उसके संवारने की। एक कथा से बात बढ़ाना चाहूंगा। एक आदमी ने एक नौकर रखा। आदमी ने नौकर से पूछा कि तुम्हारी क्या खासियत है? नौकर का जवाब था - मैं तूफान में भी चैन से सोता हूं। आदमी उलझा, बोला - तुम्हारी बात समझ नहीं पाया। नौकर बोला - समझा भी नहीं पाऊंगा। आदमी बोला - क्यों? नौकर बोला - लोग विश्वास नहीं करते हैं। आदमी बोला - मैं विश्वास करूंगा। नौकर बोला - पर मैं बातों में नहीं, काम में विश्वास रखता हूं। आदमी उसका कायल हुए बिना नहीं रहा। संतुलित जुबान, खुद पर विश्वास का अजूबा नमूना, बोला - ठीक है, तुम्हें मौका देता हूं।

नौकर को मौका मिला। वह वहां नौकरी करने लगा। वह सामान्य व्यक्ति की तरह ही काम करता, पर काम करता रहता था। उसकी दिनचर्या दुरुस्त थी। उसके पहनावे पर कभी कोई अंगुली नहीं उठा सकता था। बातें सटीक करता था। आदमी को कभी किसी चीज के लिए उसे खास तौर से ताकीद करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। मगर एक रात....।

मौसम खराब हुआ। आसमान में काले बादल घुमड़ आए। हवाओं ने जब गति पकड़ी और उसके आंधी का रूप अख्तियार करने की आशंका बनी तो आदमी घबराया। जिस मुहल्ले में वह रह रहा था, वहां के सभी लोगों में भगदड़ मची हुई थी। कोई पशुओं को छप्पर के नीचे बांध रहा था, कोई अनाज संभाल रहा था, कोई लकड़ियां बचाने की जुगत में लगा था। एक तरह से पूरे मुहल्ले में जाग हो गयी थी। ऐसे में ही आदमी ने नौकर को आवाज दी। पर, नौकर की ओर से कोई जवाब नहीं आया। एक-दो हांक लगाने के बाद वह भागा-भागा नौकर की झोपड़ी में पहुंच गया। देखता है कि नौकर आराम से चादर ताने गहरी नींद में पड़ा है और खर्राटे खींच रहा है।

अब तो आदमी आग-बबूला हो गया। झकझोर कर नौकर को जगाया और उस पर बिफर ही तो पड़ा। बड़े बकवास आदमी हो तुम, तूफान आने वाला है। पूरे मुहल्ले में भगदड़ मची हुई है और तुम खर्राटा खींच रहे हो। नौकर ने बड़े मासूमियत से पूछा - आखिर मुझसे क्या गलती हो गयी? आदमी बोला - बड़े खफ्ती आदमी हो। चलो बाहर। पशुओं को बाड़े में पहुंचाओ। लकड़ियों को घर में डालो कि वे भींगे नहीं। थोड़े अनाज भी बचा लो और घर में पहुंचा दो ताकि तूफान के दिनों में खाने-पीने की दिक्कत नहीं हो। नौकर ने जो कहा, भविष्य के लिए चिंता करने वालों को वह मार्क करना चाहिए। उसने कहा - पर यह सब तो मैं काफी पहले कर चुका हूं। आदमी अवाक।

नौकर बोला - जी हां, मैंने कहा था न कि मैं तूफान में भी चैन से सोता हूं। आप देख ही रहे हैं कि जब तूफान की आशंका से लोग भगदड़ मचाए हुए हैं, मैं यहां चैन से सो रहा था। यह मेरी लापरवाही नहीं थी। मुझे पता था कि यह तूफान के आने का महीना है और वह कभी भी आ सकता है। जब तूफान आ जाता तो मैं अकेला आदमी क्या-क्या करता। इसीलिए लकड़ियां सुखा कर पहले ही छप्पर के नीचे डाल दी थीं। अनाज इस महीने की शुरुआत में ही घर के अंदर पहुंचा दिया था। इतना ही नहीं, पिछले तीन-चार दिनों से मैंने पशुओं को रात में बाड़े में ही बांधना शुरू कर दिया है। अब बताइए मालिक, इस तूफान में मैं खर्राटे नहीं लूं तो पागल की तरह इधर-उधर भागता फिरूं?

नौकर की साइकोलाजी को यदि एक वाक्य में कहें तो कहा जा सकता है कि चिंता नहीं, सम्यक चिंतन से संवरता है भविष्य। मालिक तूफान के आने पर भविष्य की चिंता में घुल रहा था, पर नौकर इसका चिंतन काफी पहले कर चुका था और मौका आने पर तसल्ली में था, आराम में था। मुझे लगता है कि इस कथा से कुछ बातें साफ हुई होंगी। फिलहाल इतना ही। भविष्य को संवारने की दिशा में टिप्स खोजती चर्चाओं का सिलसिला अभी जारी रहेगा।

एक चुटकुला - एक आदमी ने कहा- मुझे तो आंखें बंद करने पर भी दिखाई देता है। दूसरे ने पूछा - क्या? आदमी का जवाब था - अंधेरा।