Sunday, June 2, 2013

सावधान, काफी हुनरमंद होती हैं खबरें

आइए लेते हैं खबरों की खबर - 3

खबरों से जुड़े किसी भी शख्स से यह पूछा जाए कि खबरों के कितने वर्ग होते हैं तो वह सीधे-सीधे कई खबरें गिना डालेगा। अपराध-अपराधी की खबरें, घटना-दुर्घटना की खबरें, साहित्य-संस्कृति-सामाजिक सरोकारों की खबरें, शासन-प्रशासन-विधि व्यवस्था की खबरें, शिक्षा-शिक्षक की खबरें, कारोबार-कारोबारी की खबरें, ट्रैफिक-यातायात-परिवहन की खबरें, यात्रा-पर्यटन की खबरें, संचार-दूरसंचार की खबरें, नेता-राजनीति की खबरें, संस्था-संस्थान की खबरें आदि-आदि....।

सही भी है। मोटे तौर पर खबरें इन्हीं जगहों से निकलती हैं, इन्हीं की होती हैं। मगर क्या कभी आपने सोचा कि इन्हीं खबरों के भीतर कुछ और वर्ग तैयार खड़े होते हैं, जिन पर गौर करना बेहद जरूरी हो जाता है। इन वर्गों पर गौर किए बगैर खबरों में घुसे, खबर लिखनी शुरू कर दी, लिख दी तो गड़बड़ी शुरू हो जाती है। गड़बड़ी यानी डेस्क को, आपके संपादक को और अंततः अखबार को या उस मीडिया माध्यम को जिससे आप जुड़े हुए हैं और जिसे आप खबर दे रहे हैं।

जरा सोचिए। वह कोई एक खबर ही तो होती है जो लीड बन जाती है, वह कोई एक खबर ही तो होती है जो बाटम बन जाती है। कोई खबर पहले पन्ने पर जगह ले लेती है कोई अंदर के पन्ने पर चली जाती है। वह भी खबर ही होती है जिसे टाप में बाक्स ट्रीटमेंट दिया जाता है या कह दिया जाता है कि अंदर के किसी भी पन्ने पर बाक्स लगा लें। ध्यान दें, खबर तो वह भी होती है, जिसे छापने से मना कर दिया जाता है।

खबरों का वर्गीकरण और भी हैं। यह है साइज, लेंथ। अकसर अखबारों में बेहद गंभीर चर्चाएं सिर्फ इस बात पर होती हैं कि इस खबर को लीड लगाओ पर दो कालम ट्रीटमेंट दो, तीन कालम ट्रीटमेंट दो या चार कालम से ज्यादा मत छापो। यह तो बैनर है यार, इस खबर को पूरे आठ (आजकल सात) कालम में तानकर- लहराकर छापो। इस खबर को चार कालम में क्यों लिख दिया, यह तो सिंगल कालम में भी छपने के लायक नहीं है, इस खबर को तो ब्रीफ में निपटा दो, इसमें है क्या। इस खबर को सिंगल में क्यों निपटा दिया, इसे कम से कम तीन कालम में छापने के लायक लिखो। इस खबर को किसने लिखा, क्यों लिखा, कितना पैसा खाकर लिखा आदि-आदि...। 

अब यह सोचिए, खबरों की साइज, लेंथ  और उसके प्लेसमेंट पर विचार किए बगैर आपने खबर लिख दी तो कितनी गड़बड़ होती है! एक खबर पर कितनी देर तक उलझन होगी, बहस होगी, समय बर्बाद होगा, आप डांट खाएंगे और पूरा काम करने के बाद भी निराश घर जाएंगे।

तो खबरों की दुनिया में चैन की सांस लेनी है तो उस हुनर का मास्टर बनकर रहिए जहां अगला आपको सिर्फ खबरों की लेंथ-साइज और प्लेसमेंट को लेकर क्लास लगा देता है। और इसका हुनरमंद बनना बेहद आसान है। कुछ बातें सोचने के लिए तो आपको यही आलेख मजबूर कर रहा होगा, कुछ आगे का कर देगा। इंतजार कीजिए। 

Saturday, March 23, 2013

ना ना ना ना

डगर कहता है
जरा संभल ना
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

हिसाबों में हम
किताबों में हम
सवालों में हम
जवाबों में हम

जिगर कहता है
जरा मचल ना
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

ओ काली जुल्फें
नशीली आंखें
ये मस्त जवानी
बड़ी मस्तानी

शहर कहता है
जरा बदल ना
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

लंबी गलियां
ऊंची कलियां
टेढ़ी सड़कें
चलने ना दें

सफर कहता है
जरा सा रुक ना
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

सूना दफ्तर
पसीने से तर
नगीना घर है
कमीना बिस्तर

असर कहता है
जरा फिसल ना
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

सरेंडर दिन है
कैलेंडर रातें
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

होश में हैं लोग
जोश में हैं हम
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

लंबी राहें
पुकारें आ जा
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

बताए रस्ता
इधर से ही जा
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

कोई जो बोले
कि बोलो हां हां
मगर कहता हूं
ना ना ना ना

ना ना ना ना
ना ना ना ना 

(नोट - २३ मार्च २०१३ की भोर में टार्च की लाइट में लिखी कविता)

Wednesday, February 27, 2013

इस रास्ते पर बड़े-बड़े पुण्य - एक रिपोर्ट


संगम में डुबकी लगाने वालों का कुछ ऐसा था रेला।
डेटलाइन - कुंभनगर-इलाहाबाद (२४ फरवरी २०१३)

पुण्य का मेला, आस्था का सैलाब। हर डगर, हर राह पर श्रद्धालुओं का रेला। जिधर देखिए, उधर लंबी-बहती कतार, बहुत-बहुत दूर तक। रुकने का कोई नाम नहीं ले रहा। मजबूत संकल्प कि माघी पूर्णिमा पर लगा लें गंगा-संगम की डुबकी। कैसे भी। भाग कर, दौड़ कर, मिन्नतें कर या हो जाए कोई जुगाड़। आशंका कि इतनी भीड़, न जाने कितनी और ऐसे में हो पाएगा स्नान.. निर्विघ्न! मगर, आस्था के इस रास्ते पर यह सब खत्म। घाट से पहले रेले के साथ दौड़ रहे कई-कई पुण्य प्रयास, जो कर रहे विभोर, जो डुबा ले जा रहे श्रद्धा के असीम सागर में।

शास्त्री पुल का झूंसी की तरफ का हिस्सा या अलोपी बाग का। वाराणसी-पटना से आने वाले यहीं से शामिल हो जाते हैं आस्था के सैलाब में। मिलेंगे वर्दीधारी, रोकने वाले। इधर से नहीं, उधर से जाएं। सोचते लोग किधर से जाएं। भीड़ की रेलमपेल। मगर, घबराने की बात नहीं, पुण्य दौड़ रहा है। रास्ता बताने वाले एक नहीं हजार मिल जाएंगे। उसी पुलिस वाले से दोबारा पूछ लीजिए। कैसे किधर से जाना है, कितनी दूर है, वह पूरा नक्शा बता देगा, बता रहा है। मैंने बधाई दी, पुलिस वाले का जवाब था, ड्यूटी है साहब, अपना तो यही पुण्य है।

शनिवार अपराह्न करीब तीन बजे। स्थान वहीं शास्त्री पुल। इलाहाबाद की बगल के ही किसी गांव की महिला। होश फाख्ता, उड़ा चेहरा। स्नान कर लौटने के दौरान पति से छूट गया था साथ। बेचैन थी। कभी पुल से नीचे झांकती, कभी सड़क को नापती। एक सज्जन बढ़ गए उसकी ओर। पूछा, क्या बात है। फिर पूछा, पति के पास मोबाइल है, नंबर याद है? महिला ने बताया, उन्होंने अपने मोबाइल से कॉल लगाई, बात कराई और आगे बढ़ गए। मैंने उन्हें लपका। कुछ पूछता इसके पहले ही बोलने लगे, कोई बड़ा काम नहीं किया साहब. आजकल कॉल रेट सस्ता है। महज डेढ़ रुपये में मिल गया न उसका पति, ईश्वर सबको खुश रखे।
विकलांग को संगम में डुबकी दिलाने ले जाते उसके परिवारीजन

मेला क्षेत्र में लगातार लाउडस्पीकर चालू है। कभी महिला तो कभी पुरुष की आवाज आती है। गाजीपुर के गुड्डू तिवारी, आपका बच्चा भूले-भटके शिविर में है, आ जाइए। मुजफ्फरपुर के मुरियारी के वासुदेव सिंह, आपके परिवारी जन दो घंटे से आपका इंतजार कर रहे हैं, कानपुर के कमलेश, अलीगढ़ के विश्वकर्मा ..। किसी कमरे में बंद होकर इस आवाज को सुनिए और सड़क पर इसका असर देखिए, आस्था की राह में पुण्य का यह सफलतम प्रयास ही तो है!

शनिवार रात भर की रिमझिम के बाद रविवार सुबह करीब साढ़े नौ बजे का समय। बादलों की आंखमिचौली के बीच सूरज झांकने लगा था। इसी के साथ मेला क्षेत्र में होने लगी थी श्रद्धा की बारिश। रेले की रफ्तार आस्था की राह पर कदमताल कर रही थी। दोनों पैरों से लाचार एक किशोर घसीटता संगम घाट की ओर बढ़ा जा रहा था। अजीब दृश्य। इसके पीछे एक ही बैग को थामे चल रहे थे एक बुजुर्ग और एक शर्ट-पैंट धारी सज्जन। गांव-नाम से फर्क नहीं पड़ता, पर जिज्ञासा उनकी ओर खींच ले गई। दोनों सज्जन इस विकलांग को पुण्य की डुबकी लगाने लाए थे। भई वाह! दोनों उसे कंधे से लेकर जाना चाह रहे थे और वह घसीट कर घाट जाने में ही खुश था।

दैनिक जागरण के २५ फरवरी का कुंभनगर संस्करण।
और संगम घाट। हर किसी को स्नान की हड़बड़ी। जल्दी नहा लें, कहीं फिसल न जाएं, कितना होगा पानी। पर यह क्या.. बगल वाला संभाल रहा है, बता रहा है, थाम रहा है, उतार रहा है पानी में और बाजू थाम कर निकाल भी रहा। एक महिला घाट पहुंचने की जल्दबाजी में फूल नहीं ला पाई। वह इसका जिक्र कर थी पति से। पति अभी मुड़कर जाने ही वाला था फूल लाने कि बगल की महिला ने अपने फूलों से कर लिया हिस्सा। आगे खुद ही समझाने लगी, भीड़ में ज्यादा इधर-उधर न करो, गुम हो जाओगे..। काश, पुण्य प्रयास का यह रास्ता कुंभ नगर से देश भर की डगर करता..!

Monday, December 31, 2012

आओ हे अधुनातन, रो रहा है कण-कण

मुबारक हो ... फिर आया नया साल ...


नया आकाश हो ... नया विहान ...

नई आकांक्षा ... नया वितान ...

जो बीत गया...
जो छूट गया .....

एक अर्पण, एक तर्पण
ना गुंजन, ना सृजन
रो रहा है कण-कण...

अंधेरा घना, लहू से सना
प्रत्यंचा तना, हंसना मना
रो रहा है कण-कण ...

बच्ची ने सच्ची कर दी
जान की कच्ची कर दी

इज्जत कुर्बान कर के
आन को सान दिया

जाओ हे पुरातन
तुम जल्दी जाओ

आओ हे अधुनातन
तुम जल्दी आओ

रो रहा है कण-कण...

Friday, November 23, 2012

एक राज लौटते हुए

राज है कि पथिक घर आया, ठहरा और एक सर्द अफसाने के साथ भोर के धुएं में जर्द हो गया।

राज है कि रात जो काली थी, डूबी थी अंधेरे की गर्त में, उसकी सुबह हो गई, दमक गई, चमक गई।

राज है कि न उसने कुछ बोला, न पथिक ने, मगर रात भर बातें होती रहीं, सुबह तो दोनों थक गए।

राज है कि जब सांकल बजा था तो कौन चौंका था, कौन उठा था और किसने दरवाजा खोला था।

राज है कि सांकल बजा भी था या नहीं, दरवाजा खुला भी था या नहीं, बाहर कोई था भी या नहीं।

राज है कि एक गर्मी आई थी, टकराई थी और उफ-आह के साथ चिपक गई थी दरवाजे से।

राज है कि होंठ बढ़े, सांसें टकराईं, सूनी दास्तां, खूनी दास्तां, अंधेरे से शुरू, अंधेरे में खत्म।

राज है कि सुबह आई, और भी आएंगी, पर रात लंबी हो गई, न बीती, न बीतेगी, नहीं, नहीं बीतेगी।

राज है कि जाते हुए पथिक को दो जोड़ी आंखें रोक रही थीं, लब खामोशी की चादर ओढ़े थे।

राज है कि एक चेहरा बोल रहा था, पथिक सुन रहा था, कान जर्द थे और हृदय सर्द था।

राज है कि ठिठुरती जिंदगी कैसे कांपती टांगों के साथ भोर के धुएं में रफ्ता-रफ्ता खो गई थी।

राज है कि फिर पथिक कभी क्यों रास्ता नहीं भटका, कैसे बन बैठा वह इतना सावधान।

कैसे, राज है, है न राज?

Monday, November 12, 2012

जरा दीये जलाना...

एक बाती 

ओ साथी    

अंधेरा घना है
जरा दीये जलाना
जरा हाथ बढ़ाना
अंगुलियों के रास्ते
संभलकर
घिसना 
तीलियां
माचिस की
जिन्हें जल जाना है
जिन्हें जल कर भी
दीया जलाना है
एक बाती
ओ साथी
जरा दीये जलाना
जरा हाथ बढ़ाना .......

दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ।

Sunday, November 11, 2012

धन बरसे गगन बरसे

बनारस के सुड़िया में स्थापित यह हैं भगवान धन्वंतरि। 

अहा, बनारस में माता अन्नपूर्णेश्वरी  की यह स्वर्ण प्रतिमा, कितना मनोरम!

धन बरसे, 
तन बरसे 
 
थोड़ा-थोड़ा बरसे 

मन बरसे


बरसे बरसे
गगन बरसे
 
मगन बरसे
लगन बरसे
 
आग लगे पानी 
में अगन बरसे
 
धनतेरस का दिन है
 
भुवन बरसे, 
 भुवन बरसे, 
 भुवन बरसे  ...... 

धनतेरस पर ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ.....