Wednesday, February 27, 2013

इस रास्ते पर बड़े-बड़े पुण्य - एक रिपोर्ट


संगम में डुबकी लगाने वालों का कुछ ऐसा था रेला।
डेटलाइन - कुंभनगर-इलाहाबाद (२४ फरवरी २०१३)

पुण्य का मेला, आस्था का सैलाब। हर डगर, हर राह पर श्रद्धालुओं का रेला। जिधर देखिए, उधर लंबी-बहती कतार, बहुत-बहुत दूर तक। रुकने का कोई नाम नहीं ले रहा। मजबूत संकल्प कि माघी पूर्णिमा पर लगा लें गंगा-संगम की डुबकी। कैसे भी। भाग कर, दौड़ कर, मिन्नतें कर या हो जाए कोई जुगाड़। आशंका कि इतनी भीड़, न जाने कितनी और ऐसे में हो पाएगा स्नान.. निर्विघ्न! मगर, आस्था के इस रास्ते पर यह सब खत्म। घाट से पहले रेले के साथ दौड़ रहे कई-कई पुण्य प्रयास, जो कर रहे विभोर, जो डुबा ले जा रहे श्रद्धा के असीम सागर में।

शास्त्री पुल का झूंसी की तरफ का हिस्सा या अलोपी बाग का। वाराणसी-पटना से आने वाले यहीं से शामिल हो जाते हैं आस्था के सैलाब में। मिलेंगे वर्दीधारी, रोकने वाले। इधर से नहीं, उधर से जाएं। सोचते लोग किधर से जाएं। भीड़ की रेलमपेल। मगर, घबराने की बात नहीं, पुण्य दौड़ रहा है। रास्ता बताने वाले एक नहीं हजार मिल जाएंगे। उसी पुलिस वाले से दोबारा पूछ लीजिए। कैसे किधर से जाना है, कितनी दूर है, वह पूरा नक्शा बता देगा, बता रहा है। मैंने बधाई दी, पुलिस वाले का जवाब था, ड्यूटी है साहब, अपना तो यही पुण्य है।

शनिवार अपराह्न करीब तीन बजे। स्थान वहीं शास्त्री पुल। इलाहाबाद की बगल के ही किसी गांव की महिला। होश फाख्ता, उड़ा चेहरा। स्नान कर लौटने के दौरान पति से छूट गया था साथ। बेचैन थी। कभी पुल से नीचे झांकती, कभी सड़क को नापती। एक सज्जन बढ़ गए उसकी ओर। पूछा, क्या बात है। फिर पूछा, पति के पास मोबाइल है, नंबर याद है? महिला ने बताया, उन्होंने अपने मोबाइल से कॉल लगाई, बात कराई और आगे बढ़ गए। मैंने उन्हें लपका। कुछ पूछता इसके पहले ही बोलने लगे, कोई बड़ा काम नहीं किया साहब. आजकल कॉल रेट सस्ता है। महज डेढ़ रुपये में मिल गया न उसका पति, ईश्वर सबको खुश रखे।
विकलांग को संगम में डुबकी दिलाने ले जाते उसके परिवारीजन

मेला क्षेत्र में लगातार लाउडस्पीकर चालू है। कभी महिला तो कभी पुरुष की आवाज आती है। गाजीपुर के गुड्डू तिवारी, आपका बच्चा भूले-भटके शिविर में है, आ जाइए। मुजफ्फरपुर के मुरियारी के वासुदेव सिंह, आपके परिवारी जन दो घंटे से आपका इंतजार कर रहे हैं, कानपुर के कमलेश, अलीगढ़ के विश्वकर्मा ..। किसी कमरे में बंद होकर इस आवाज को सुनिए और सड़क पर इसका असर देखिए, आस्था की राह में पुण्य का यह सफलतम प्रयास ही तो है!

शनिवार रात भर की रिमझिम के बाद रविवार सुबह करीब साढ़े नौ बजे का समय। बादलों की आंखमिचौली के बीच सूरज झांकने लगा था। इसी के साथ मेला क्षेत्र में होने लगी थी श्रद्धा की बारिश। रेले की रफ्तार आस्था की राह पर कदमताल कर रही थी। दोनों पैरों से लाचार एक किशोर घसीटता संगम घाट की ओर बढ़ा जा रहा था। अजीब दृश्य। इसके पीछे एक ही बैग को थामे चल रहे थे एक बुजुर्ग और एक शर्ट-पैंट धारी सज्जन। गांव-नाम से फर्क नहीं पड़ता, पर जिज्ञासा उनकी ओर खींच ले गई। दोनों सज्जन इस विकलांग को पुण्य की डुबकी लगाने लाए थे। भई वाह! दोनों उसे कंधे से लेकर जाना चाह रहे थे और वह घसीट कर घाट जाने में ही खुश था।

दैनिक जागरण के २५ फरवरी का कुंभनगर संस्करण।
और संगम घाट। हर किसी को स्नान की हड़बड़ी। जल्दी नहा लें, कहीं फिसल न जाएं, कितना होगा पानी। पर यह क्या.. बगल वाला संभाल रहा है, बता रहा है, थाम रहा है, उतार रहा है पानी में और बाजू थाम कर निकाल भी रहा। एक महिला घाट पहुंचने की जल्दबाजी में फूल नहीं ला पाई। वह इसका जिक्र कर थी पति से। पति अभी मुड़कर जाने ही वाला था फूल लाने कि बगल की महिला ने अपने फूलों से कर लिया हिस्सा। आगे खुद ही समझाने लगी, भीड़ में ज्यादा इधर-उधर न करो, गुम हो जाओगे..। काश, पुण्य प्रयास का यह रास्ता कुंभ नगर से देश भर की डगर करता..!

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