Friday, August 21, 2009

कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

भविष्य सुधारने के लिए आप क्या करते हैं? सपने देखते हैं और उसे साकार करने की कोशिशें करते हैं। सपने साकार हुए तो अच्छा और टूट गये तो .....? डर यहीं होता है, घबराहट यहीं होती है। इलाहाबाद से मेरे एक मित्र श्री सतीश श्रीवास्तव ने सुझाया है कि भविष्य संवारने के सिलसिले में मैं अपने ब्लाग पर गोपाल दास नीरज की उस कविता को पूरा का पूरा रखूं, जिसमें उन्होंने फरमाया है कि कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है, चंद खिलौने के खोने से बचपन नहीं मरा करता है। सो, मित्र की बातों पर अमल करते हुए परम आदरणीय, सुप्रसिद्ध कवि व गीतकार नीरज जी के प्रति पूर्ण सम्मान भाव के साथ उनकी रचना मैं यहां अपनी श्रृंखला में ऱखता हूं। इस आशा के साथ कि मेरे मित्र की बातें सही साबित हों और भविष्य संवारने की दिशा में जुटे लोगों में इससे कुछ आशाओं का संचार हो पाये। सो पेश है गोपाल दास नीरज की यह अमर रचना -

छिप-छिप अश्रु बहाने वालो
मोती व्यर्थ लुटाने वालो
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आंख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालो
डूबे बिना नहाने वालो
कुछ पानी के बह जाने से
सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आंसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रुठे दिवस मनाने वालो
फटी कमीज सिलाने वालो
कुछ दीयों के बुझ जाने से
आंगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहां पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालो
चाल बदलकर जाने वालो
चंद खिलौनों के खोने से
बचपन नहीं मरा करता है।

व्यक्तित्व विकास के सिलसिले में भविष्य संवारने के नुस्खों का जिक्र करती बातें अभी जारी रहेंगी। धन्यवाद।

Friday, August 14, 2009

अमर उजाला को धन्यवाद

अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल के गांव जलालपुर चलने का आह्वान करती 'विचार' की पिछली पोस्ट को 'अमर उजाला' ने अपने छह अगस्त के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर 'ब्लाग कोना' में जगह दी है। इसके लिए अखबार की पूरी टीम को मेरी ओर से धन्यवाद। इससे मेरा उत्साहबर्द्धन हुआ।

Tuesday, August 4, 2009

चलिए शहीद बैकुंठ शुक्ल के गांव जलालपुर

सरकारी गवाह बन गये गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष की दिनदहाड़े हत्या कर अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव की मौत का बदला लेने वाले बैकुंठ शुक्ल व हजारीबाग जेल से अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के हीरो जयप्रकाश नारायण को कंधे पर चढ़ा फरार करा देने वाले योगेन्द्र शुक्ल का गांव है जलालपुर। आपके मन में आजादी के प्रति सामान्य जज्बा भी जीवित होगा तो इस गांव की मिट्टी को चंदन समझ माथे पर लगा लेंगे। रोज नहीं तो 15 अगस्त तथा 26 जनवरी को तो अवश्य ही। अफसोस! यहां इन अवसरों पर भी शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले जैसा नजारा नजर नहीं आता। आइए, आपको स्वतंत्रता संग्राम के इस महान तीर्थ यानी जलालपुर तक लें चलें।
आप अगर बिहार की राजधानी पटना से यहां आना चाहते हैं तो आपको गंगा पार कर हाजीपुर आना होगा। हाजीपुर से लालगंज और वहां से रिक्शा या आटो से आप इस तीर्थ स्थल तक पहुंच सकते हैं।. उत्तर बिहार की राजधानी मुजफ्फरपुर से इस माटी को चूमने जाना चाहते हैं तो आपको बस से लालगंज और वहां से फिर आटो या रिक्शा से सफर करना होगा। इस दौरान भूल से भी आप किसी ऐसे शिलापट्ट की कल्पना मत कीजिएगा जिस पर यह लिखा हो कि यह रास्ता स्वतंत्रता संग्राम के दो अमर सपूतों के गांव तक जाता है।
वैसे इस गांव के किनारे पर ही अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल की एक मूर्ति लगी है। जानकर ताज्जुब हुआ कि यह मूर्ति भी उनके भतीजे की खुद की खरीदी जमीन पर स्थापित है। लोग बताते हैं कि इस मूर्ति स्थापन में वर्तमान आपदा प्रबंधन मंत्री देवेश चंद्र ठाकुर का भी योगदान है। इस मूर्ति का अनावरण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों हुआ है, पर इसके लिए कोई कार्यक्रम नहीं लगा था। वे राजनीति के असली चेहरे को और चमकाने खंजाहाचक जा रहे थे। मूर्ति के पास लोग खड़े थे। लोगों ने उनसे आग्रह किया। उन्होंने इस आग्रह को ठुकराया नहीं। इस मूर्ति की बगल में ही स्वतंत्रता सेनानी योगेन्द्र शुक्ल की पुत्रवधू शारदा शुक्ल अपने परिवार के साथ रहती हैं। इनके निजी मकान में एक स्थल बन रहा है, जहां सेनानी योगेन्द्र शुक्ल की प्रतिमा लगनी है। बताते हैं कि इसमें विधायक विजय कुमार शुक्ला का योगदान है।
आइए, अब इतिहास के पन्नों में चलें। फणीन्द्र नाथ घोष उस आदमी का नाम है, जो देश को आजाद करने के लिए चले क्रांतिकारी आंदोलन में सरकारी गवाह बन गया था। उसकी गवाही के आधार पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया गया। बैकुंठ शुक्ल ने दिनदहाड़े बेतिया के मीना बाजार में इस गद्दार को कुल्हाड़ी से काट डाला। अब जानिये योगेन्द्र शुक्ल के बारे में। इन्हें क्रांतिकारी आंदोलन का दिमाग और गुरिल्ला तौर-तरीकों का मास्टर कहा जाता था। इनके कंधे पर चढ़कर जेपी हजारीबाग जेल से फरार हुए थे।
ये घटनाएं तो बानगी हैं। शुक्ल बंधुओं का पोर-पोर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। स्वतंत्रता का आनंद लेने वालों का भी पोर-पोर इनका ऋणी होना चाहिए। फिर इनके लिए और कुछ नहीं तो इतना तो होना ही चाहिए कि पटना, हाजीपुर और मुजफ्फरपुर स्टेशनों पर लिखा मिले कि यहां से उतरकर आप बैकुंठ शुक्ल और योगेन्द्र शुक्ल की मिट्टी को प्रणाम करने जा सकते हैं। मान लेते हैं कि किन्हीं कारणों से इन स्थानों पर यह सूचना पट्ट नजर नहीं आते, लेकिन लालगंज में तो यह नजर आना ही चाहिए था। आप लालगंज में भी इस सूचना को तलाशेंगे तो आपकी आंखें केवल तरसती रहेंगी। लालगंज के तीनपुलवा चौक पर भगवान बुद्ध की एक मूर्ति लगी है। लोग बताते हैं कि यहां बैकुंठ शुक्ल की मूर्ति लगनी थी।
छोडि़ये लालगंज, इनके गांव जलालपुर में इनकी स्मृति में एक पुस्तकालय बना था। वर्तमान में यह पुस्तकालय भी पंचायत भवन बन गया है। पंचायत भवन में भी ऐसा कुछ नहीं है, जिसे देखकर लगे कि ये सब शहादत को सलाम के लिए है। गांव में ही एक प्रोजेक्ट बालिका विद्यालय की शुरुआत शहीदों के नाम पर हुई थी, पर अब यह जलालपुर बालिका विद्यालय है। बैकुंठ शुक्ल के घर पर आज भी वह कमरा खंडहर के रूप में खड़ा है, जहां बैकुंठ शुक्ल की शहादत के बाद उनकी धर्मपत्नी राधिका देवी ने अंतिम सांसें लीं। भतीजे शशि नाथ शुक्ल वहां स्मृति में स्मारक बनाने की बात कहते हैं।
इस स्थिति के लिए कौन दोषी है? इस बाबत किसी और को कुछ कहने से पहले राष्ट्रकवि रामधारी दिनकर की पंक्तियों समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध को याद कर अपने दामन में भी देखने की आवश्यकता है। कविता की बात हो रही है तो आइए माखनलाल चतुर्वेदी की इन लाइनों चाह नहीं मैं सुरबाला के, गहनों में गूंथा जाऊं, चाह नहीं प्रेमी-माला में, बिंध प्यारी को ललचाऊं, चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊं, चाह नहीं, देवों के सिर पर, चढ़ूं भाग्य पर इठलाऊं, मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जाएं वीर अनेक को भी याद करें। फिर, इधर-उधर देखें कि इन लाइनों को जीने वाले कहां हैं? बहरहाल कुछ भी हो, इससे हमारे-आपके ऊपर तो फर्क पड़ता है, इस मिट्टी पर नहीं। यह मिट्टी तो स्वतंत्रता संग्राम का चंदन है। इसे माथे पर लगाइए।

गांधीजी के लिए योगीराज थे योगेन्द्र शुक्ल
जलालपुर के ही 88 वर्षीय वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी जयनंदन शुक्ल योगेन्द्र शुक्ल को याद करते फफक कर रो पड़े। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी योगेन्द्र शुक्ल को योगीराज कहते थे। साबरमती आश्रम में अपने निवास के दौरान योगेन्द्र शुक्ल कभी प्रार्थना में शामिल नहीं होते थे। कुछ क्रांतिकारियों ने इसकी शिकायत बापू से की तो बापू ने कहा कि जिस मुकाम को हासिल करने के लिए हम सभी प्रार्थना करते हैं, उस मुकाम को योगीराज हासिल कर चुके हैं। एक बार उन्हें पुरस्कार स्वरूप 1700 रुपये मिले तो खुश होकर उन्होंने एसडीओ के सामने ही उनके चपरासी को दस रुपये की बख्शीश दे दी। चपरासी घबराया कि रिश्वत के आरोप में बर्खास्त हो जाऊंगा। योगेन्द्र बाबू बोले कि ऐसा हुआ तो तुम्हारे एसडीओ को एक झापड़ (थप्पड़) लगाऊंगा। तब एसडीओ के कहने पर चपरासी ने बख्शीश रख ली थी। उनकी पुत्रवधू शारदा जी ने बताया कि बाद के दिनों में बाबूजी चुप रहते थे। आजादी के बाद बनी सरकार को सदा बेईमान ही कहते थे। मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह कई दफे उनसे मिलकर उन्हें कुछ देना चाहते थे, पर बाबूजी हमेशा उन्हें फटकार कर भगा देते थे। बाबूजी का मिजाज ऐसा था कि एक बार जिस पर से विश्वास हट जाता था तो वे फिर उस पर विश्वास नहीं करते थे। पूछने पर भी कभी किसी से आंदोलन और लड़ाई के बारे में कुछ भी शेयर नहीं करते थे। बाद में पटना काटेज में निवास के दौरान उनका पेट खराब रहने लगा। 19 नवंबर 1966 को अतिसार की बीमारी की वजह से ही उनकी मौत हो गयी।

भीख मांगें? हमें कुछ नहीं चाहिए

अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल के भतीजे शशिनाथ शुक्ल हों या सेनानी योगेन्द्र शुक्ल की 74 वर्षीय पुत्रवधू शारदा शुक्ल, दोनों का एक ही कहना था, हमें किसी से कुछ नहीं चाहिए। हमारे पूर्वजों ने जब किसी से कुछ नहीं लिया तो उनके नाम पर हम भीख मांगें? शारदा जी कहती हैं कि जब बाबूजी बीमार थे तो जयप्रकाश जी उनके पास आये थे और कहा था कि चलिये, हम आपकी सेवा करेंगे। बाबूजी ने तत्काल उत्तर दिया था-'नहीं ऐसा नहीं हो सकता है। आप हमारी सेवा में लग जायेंगे तो देश सेवा कौन करेगा।शशि नाथ शुक्ल कहते हैं कि चाचाजी (बैकुंठ शुक्ल) को तो हमलोगों ने नहीं देखा। चाची जी (राधिका देवी) थीं। शिक्षिका चाची जी ने खुद ही सरकारी पेंशन और सुविधाओं को ठुकरा दिया था। वे अपनी पेंशन उठाती रही थीं। बहरहाल, उन्हें लगता है कि चाचा और चाची जी की स्मृति में यहां कुछ न कुछ ऐसा होना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को उनके बारे में पता चल सके। शशि नाथ शुक्ल की एक समस्या यह भी है कि चाचा जी के बारे में बहुत सारे लोग जानने आये, एक-एक कर घर में रखी उनकी तस्वीर यह कहकर ले गये कि लौटा जायेंगे, पर कोई मुड़कर नहीं आया। गांव के युवक अभिषेक कुमार का आक्रोश देखिए, छोटी-छोटी अपराध की घटनाओं पर फिल्म बन जाती है। अभी मुंबई कांड पर फिल्म बनी है। अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल पर भी फिल्म बननी चाहिए।


आप सारे जवाब जानते हैं, इससे बेहतर है कि आप कुछ सवाल जानें। - जेम्स थर्बर

Saturday, July 18, 2009

भविष्य को रिस्क चाहिए

जी हां, चिंता करने की नहीं, भविष्य बनाने की चीज है। आप चाहें तो आपका भविष्य बन सकता है, चाहें तो बिगड़ सकता है। भविष्य रिस्क है। जिसने रिस्क लिया, उसका भविष्य हमेशा उज्ज्वल रहा। जिसने रिस्क नहीं लिया. वह पड़ा रहा, सड़ता रहा। जिस भविष्य की चिंता में हम घुलते रहते हैं, हलकान होते रहते हैं, परेशान रहते हैं, हाय-तोबा मचाते रहते हैं, वह भविष्य रिस्क मांगता है। रिस्क। कुछ करने के लिए, कुछ पाने के लिए रिस्क का बड़ा महत्व है।
हमारे एक मित्र हैं। एक संस्थान में वे बिल्कुल ऊब चुके थे। बॉस से भी छत्तीस का आंकड़ा चल रहा था। हम मित्रों से अपनी परेशानी शेयर करते थे। हम सभी का यही सुझाव होता था कि भई बेहतर संस्थान है, थोड़ी-बहुत परेशानी को मत देखिए, तीस दिनों पर मिलने वाली तनख्वाह का ख्याल कीजिए। वे चुप हो जाते। एक दिन वे सीधे दफ्तर पहुंचे, अपनी टेबल पर बैठे और इस्तीफा लिखकर पहुंच गये बॉस के केबिन में। बॉस सन्नाटे में, थोड़ी देर बाद दफ्तर भी। लोग मित्र को समझा रहे थे कि ये आपने क्या कर दिया? मगर नहीं, वे पूरी तरह आत्मविश्वास से लबरेज थे। दोस्तों के जवाब में सिर्फ इतना ही कहा- रिस्क लिया।
आगे जो हुआ, वह दिलचस्प है। वे अगले ही रोज सीधा प्रतिद्वंद्वी संस्थान में पहुंचे। वहां उन्हें न केवल हाथोहाथ लिया गया, बल्कि एक प्रमोशन और वेतन में तीन-चार हजार रुपये की बढ़ोतरी तक दी गयी। अगले रोज से वह खुश चल रहे थे। कुछ लोगों ने पूछा कि अगर प्रतिद्वंद्वी संस्थान में आप हाथोहाथ नहीं लिये जाते तो क्या होता, आप क्या करते? जवाब सीधा था- रिस्क लिया था, कैसे न हाथोहाथ लिये जाते? और यदि हाथोहाथ नहीं लिये जाते तो क्या दुनिया इसी शहर और उसी संस्थान तक खत्म हो जाती है? आगे बढ़ जाता। यहां तक जन्म लेते ही तो नहीं पहुंच गया था? शुरुआत कहीं न कहीं जीरो से ही तो हुई थी। आज तो अपने पास उम्र और अनुभव का खजाना है। इसके साथ क्या यहां से एक कदम आगे नहीं जा सकता? सवाल पूछने वाले चुप। सबक लेने और विचार करने वाली बात थी। इसी साथी की बात करूं तो जान लीजिए कि वे उस संस्थान में भी ज्यादा दिनों तक नहीं टिके। थोड़ा और रिस्क लिया और जिस समय में उनके साथ के लोग कनीय और ज्यादा से ज्यादा वरीय बने घूम रहे थे, उसी समय में वे चीफ की हैसियत में आ गये। आज वे एक इकाई के प्रभार में चल रहे हैं।
रिस्क नहीं लिया तो भविष्य खराब हो जाता है, यह एक अन्य साथी के कदम से समझा जा सकता है। मेरे साथ काम करने वाले ही एक साथी की बात है। जानकार, विद्वान, चिंतक, अध्ययनशील, पर रिस्क नहीं ले सकते। रिस्क लेने के मौके पर बुरी तरह घबरा जाते हैं, उनकी पेशानी पर पसीने चुहचुहाने लगते हैं। चूंकि विद्वान हैं, इसलिए दूसरों के विचारों से जल्दी सहमत भी नहीं हो पाते और कांटा बॉस से ही जाकर फंसता है। संस्थान कोई हो, बॉस उनसे नाराज ही रहता है। बॉस ने उन्हें प्रमोट कर आगे नहीं बढ़ाया और उनके जूनियर जो उनसे कम काबिल थे प्रमोट होकर उनके बराबर पहुंच गये। जिस दिन यह हादसा सार्वजनिक हुआ, उस रोज वे काफी परेशान और हलकान थे। मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने रुआंसे अंदाज में कहा कि संस्थान बदलना पड़े तो पड़े, एक प्रमोशन दिलवाइए।
मैं क्या करता? दोस्त थे, फोन घुमाना शुरू किया। संयोग... बात बनी और ऐसी बनी कि एक घंटे के अंदर उनके लिए प्रमोशन और बेहतर पैकेज का आफर हाथ आ गया। बस करना इतना था कि उसी रात निकलकर उन्हें उस संस्थान के बॉस से कल इंटरव्यू के लिए मिलना था। पर, यह क्या? साथी को पता नहीं कौन सा सिंड्रोम जकड़ गया। देखते-देखते वे पसीने-पसीने हो गये। अंततः जिस साथी ने उनके लिए अपने संस्थान में बात चलायी थी, उससे फोन पर उन्होंने माफी मांगते हुए इनकार कर दिया। नतीजा- उन्होंने एक वेलविशर खोया और पुराने संस्थान में बुरे हाल में पड़े रहकर हलकान होते रहे और बॉस के कई उल्टे-सीधे फैसले झेलने को मजबूर रहे। मेरी समझ से पूरा मामला रिस्क का था। रिस्क लेने में वे पीछे पड़ गये वर्ना वे आज कहीं से कहीं होते।
यहां एक बात कही जा सकती है। कभी-कभी रिस्क लेना उल्टा भी पड़ जाता है। पर, यहीं यह ठीक से समझ लेने की जरूरत है कि उल्टा पड़ने की संभावना नहीं हो तो इसे रिस्क ही क्यों कहा जाय? क्यों ठीक कहा न मैंने? सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आपने कितनी फोर्स के साथ रिस्क लिया। रिस्क आपके इरादों और आपके हौसलों का इम्तिहान भी लेता है। पर, जिसे भविष्य संवारना हो, वह इम्तिहान से भला क्योंकर डरेगा? वह तो रिस्क उठायेगा और भविष्य संवारेगा। क्या आप भी ऐसा करने को तैयार हैं? फिलहाल इतना ही। व्यक्तित्व विकास की श्रृंखला में भविष्य संवारने के नुस्खों पर अभी चर्चा जारी रहेगी।


एक चुटकुला : एक दोस्त ने दूसरे से कहा, अपराध से कुछ भी हासिल नहीं होता। दूसरे ने कुछ सोचकर कहा- इसका मतलब मैं जो जॉब कर रहा हूं, वह क्या अपराध है? क्योंकि इस जॉब से तो मुझे कुछ भी हासिल नहीं हो रहा।

Tuesday, July 14, 2009

कुछ ऐसा भी है भविष्य का मैकेनिज्म

आदमी अनाम और शिशु के स्वरूप में जन्म लेता है। शिशु का भविष्य क्या है? उसका नामकरण, उसका लालन-पालन। फिर भविषय क्या है? उसका सही तरीके से पठन-पाठन। फिर क्या है? उसका रोजी-रोजगार। फिर क्या? शादी विवाह। फिर? बाल-बच्चे। इसके बाद ? अपने बच्चों का पालन-पोषण। फिर? उसकी पढ़ाई - लिखाई, शादी-ब्याह। फिर? बुढापा, उपेक्षा, अकेलापन। फिर? उदासी। फिर? जीवन की ईहलीला समाप्त। इतना भी तब, जब कहने -सुनने की बात तक ही सब सीमित हो। झटके बीच में कई हैं। बीमारी, दुर्घटना, प्राकृतिक प्रकोप। एक बच्चा जन्म लेता है और जन्मते ही खत्म हो जाता है। जीवन के किसी मोड़ पर आगे के जीवन का कोई संज्ञान नहीं होता। कहते हैं न, पल का पता नहीं और सामान सौ साल का। आदमी पल बीतने के साथ ही क्या से क्या हो जाता है, कहां से कहां पहुंच जाता है, यह तो हम सभी जानते हैं। हम यह भी जानते हैं कि कुछ हासिल करना हो तो उसके लिए छोटे-छोटे एजेंडे तय करने पड़ते हैं और उस पर कड़ी मेहनत से काम करना होता है। सफलता फिर भी हाथों नहीं होती। मैन प्रोपेजेज गाड डिस्पोजेज का संज्ञान हो तो इसे ठीक से समझा जा सकता है। भविष्य गुजरते दिन के साथ गुजरता जाता है, खासकर इसलिए कि हर दिन नया होता है, हर दिन का अपना एजेंडा होता है। उसका भविष्य भी उसी के साथ चलता है और उसके गुजरते उसका भविष्य भी गुजर जाता है। नये दिन की शुरुआत भविष्य से करनी ठीक होगी क्या? अभी तो उसका वर्तमान ही चालू होता है और कोई उसे भविष्य माने बैठा है। मुझे लगता है, गड़बड़ी यहीं होती है। हमारे गांव में एक देहाती लोकोक्ति है- बाबा मरीहें त बैल बिकाई। मतलब- बाबा मरेंगे तो बैल बिकेगा। मजाक की यह लोकोक्ति वर्तमान को फोकस करती है और वर्तमान को संवारने का संकल्प लेने को उत्सुक करती है। क्यों? क्योंकि वर्तमान ही भूत होने वाला है, भविष्य का निर्धारण भी यही करता है।
और भविष्य की चिंता का आलम देखिए। लोग चिंता करते हैं और चिंताओं में खुद को घुला डालते हैं। हड्डी निकल आती है, पीले पड़ जाते हैं। मेरे एक कनिष्ठ सहकर्मी की चर्चा करना चाहूंगा। संपादक से उनकी नहीं बन रही थी। बड़े परेशान थे। चुपचाप सुनते थे और घुलते थे। मेरी एक आदत है। फ्रेंड सर्कल में जब भी मैं किसी से मिलता हूं तो यह जरूर पूछता हूं कि क्या हाल है भई, कोई दिक्कत तो नहीं? सच मानिये, कोई दिक्कत तो नहीं मैं यूं ही नहीं पूछता। इस सवाल से लोग अपनी दिक्कतें शेयर करने लगते हैं और कभी किसी के काम आने का मौका मिल जाता है। मैंने महसूस किया है, कोई मनपसंद खाना खाकर, किसी अच्छी जगह सैर कर या फिर कोई नौकरी, कोई पदोन्नति पाकर मुझे कभी उतनी खुशी नहीं हुई, जितनी कभी किसी के काम आने वाला काम करके हुई। तो एक दिन उस साथी से भी इसी अंदाज में मैंने पूछ डाला। और बस, वे लगे बताने। उनके कहने का कुल मतलब इतना ही था कि वे संपादक के आदेश दर आदेश से दबे हुए थे। खुद की स्टेमिना कम थी और नुक्स निकल आने के बाद नौकरी से निकाल दिये जाने का भय सता रहा था। वे फफक रहे थे कि मेरा तो भविष्य चौपट हो गया। मैं क्या करूं? मेरी समझ में इतनी ही बात आयी कि साथी को अपनी समग्र चिंताओं के साथ एक बार संपादक से बात करनी चाहिए। इस प्रस्ताव को मानने को वे कतई तैयार नहीं थे। खतरा और बढ़ जाने का खतरा था। फिर मैंने उन्हें कुछ यूं समझाया।
खतरा क्या है? कितनी तनख्वाह है आपकी? पांच-सात -दस हजार? साथी तब सात हजार रुपये प्रति महीने पर नियुक्त थे। मैंने कहा- आज महीने की दस तारीख है। आप तनख्वाह ले चुके हैं। अब यह सात हजार रुपये आपको अगले महीने की सात तारीख को ही मिल पायेंगे। आपके पास आज से कम से कम २७-२८ दिनों का समय है। है कि नही? उन्होंने घुंडी घुमायी, कहा-हां। उनसे मैंने फिर कहा, आप अभी जाकर संपादक से बात करें। अपनी बातों को रखें और यह मानकर रखें कि आज से आपकी नौकरी खत्म। नौकरी खत्म होने से क्या होगा? आपको सात रुपये प्रति महीने मिलने बंद हो जायेंगे। यह भी सात हजार रुपये आप एक महीने बाद ही उठा पायेंगे। और मान लेते हैं कि आज नौकरी चली गयी तो आज से तीन महीने बाद तक आप बेरोजगार रहेंगे। तो यदि नौकरी रहती तो इस बीच आप कितनी रकम बना पाते, इक्कीस हजार। इक्कीस हजार का आज इंतजाम करते हैं। हित-मित्र, नाते-रिश्तेदार आदि से। हो पायेगा कि नहीं, इतनी रकम का इंतजाम? उन्होंने कहा-हां। तो इंतजाम करते हैं और तीन महीने के लिए निश्चिंत और इस दौरान क्या सात हजार रुपये की नौकरी आप नहीं खोज पायेंगे। यदि नहीं खोज पायेंगे तो मान लीजिए कि आप दीन-हीन , लाचार और बेबस इंसान हैं। तब तो फिर कोई चिंता नहीं, फिर कोई बात नहीं। और यदि हिम्मत हो, खुद पर भरोसा हो तो निदान इतना ही है कि भविष्य की चिंता छोड़िए, फिक्र वर्तमान की कीजिए, इंतजाम वर्तमान का कीजिए। क्योंकि इसी वर्तमान के साथ आपका भविष्य भी गुजरने वाला है। बात उनकी समझ में आयी। पहला असर तो यह देखा कि चेहरे से तनाव खत्म हो गया था। फिर बोले-आपने तो आंखें खोल दीं। आज वे विपरीत परिस्थितियों में भी काफी सुकून में दिखते हैं। संपादक से तो उन्होंने बात नहीं की। दरअसल, उन्होंने खुद को ही थोड़ा अरेंज कर लिया, भविष्य की चिंता छोड़ वर्तमान पर ज्यादा ध्यान देने लगे और नतीजा-वर्तमान ठीक। वर्तमान ठीक तो भविष्य भी ठीक। और चिंता? अब तो वे भी कहने लगे हैं कि अब चिंता काहे की??
(फिलहाल इतना ही। भविष्य को लेकर बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह अभी जारी रहेगा। व्यक्तित्व विकास के लिए सतर्क व्यक्ति इंतजार करें अगली पोस्ट का।)


जो नहीं है उस पर दुख मनाने से बेहतर है जो है उस पर खुश हुआ जाय।

Wednesday, July 8, 2009

... फिर भी बचा रहता है भविष्य

आदमी डरता है, घबराता है, भाग-दौड़ करता है, हड़बड़ी-जल्दबाजी मचाता है, नैतिक-अनैतिक सबकुछ करता है, करने को तैयार रहता है, काहे के लिए? भविष्य के लिए ही न? कुछ अपने भविष्य के लिए तो कुछ बच्चों के भविष्य के लिए ही न? सोचों की थोड़ी ऊंची उड़ान ली जाय तो समाज के लिए, कौम के लिए और देश के लिए ही न। छोटी-छोटी घटनाओं पर लोग-बाग हाय-तोबा मचाते हैं कि चौपट हो गया भविष्य, बर्बाद हो गये हम। और ध्यान देने की बात यह है कि जिस वक्त हम ऐसा बोलते रहते हैं, सोचते रहते हैं, समझते रहते हैं, उस वक्त भी हमारा वर्तमान हमारे साथ रहता है, पलक झपकने के साथ वह भूत तो हो जाता है, पर भविष्य पर कुछ भी फोकस नहीं होता। भविष्य तो भविष्य ही रह जाता है। पहुंच से दूर, पकड़ से बाहर।
भविष्य का बड़ा घनचक्कर है। कल ये करूंगा, कल वो करूंगा। और कल कभी आता है? आता तो आज है, गाता है, चला जाता है। और हम कल की मुलाकातों के ख्यालातों में ही रह जाते हैं। रह जाते हैं कि नहीं? भविष्य एक सपना है, एक कल्पना है। सपनों में जीने वाला आदमी, कल्पनाओं में समय व्यतीत करने वाला आदमी यानी भविष्य संवारने के चक्कर में फंसा आदमी, चाहे वह रोगी हो, योगी हो, भोगी हो, कदम दर कदम समझौता दर समझौता ही तो करता चलता है। कोई भी समझदार व्यक्ति यह कह सकता है, जिसे कदम दर कदम समझौता दर समझौता करना पड़े, उसका चाहे सबकुछ ठीक हो जाये, भविष्य तो कतई ठीक नहीं हो सकता। हो सकता है क्या? तो क्या करें, कैसे समझें भविष्य की उलझन को?
भविष्य का घनचक्कर व्यक्तित्व विकास के मार्ग को कैसे प्रभावित करता है, अब जरा इस पर विचार करें। एक कहावत सुनी होगी आपने। रोपा पेड़ बबूल का, आम कहां से आये। मतलब? भविष्य जो है, वह वर्तमान का बिल्कुल उचित परिणाम भर है। और कुछ नहीं है। यानी जब आप बबूल का पौधा लगायेंगे तो उसमें से आने वाले दिनों में आम के फल नहीं मिल सकते, नहीं मिलेंगे, नहीं मिलते हैं। आम का फल चाहिए तो आम के पौधे ही लगाने होंगे। आपने किसी को गाली दी तो आपका भविष्य आपको आपकी पिटाई का न्योता दे रहा है, इसे गंभीरता से समझने की जरूरत है। आपने जहर पीया तो आपका भविष्य आपकी मौत को आमंत्रित कर चुका है। आपने परीक्षा में सभी प्रश्न हल किये तो आपका भविष्य आपको पहले स्थान पर स्थापित करने वाला है। तो यह तय है कि आप कल परीक्षा में पास हों, कुछ सुपरिणाम आपके हिस्से में आयें, इसके लिए जरूरी है कि आप भविष्य नहीं, वर्तमान और वर्तमान की हरकतों पर ध्यान दें।
भविष्य को लेकर जो शीर्षक बनाया गया है, उसके जेरेसाया कुछ अलहदा , कुछ महत्वपूर्ण बातें कहना चाहता हूं। यह पूरी चर्चा बस उस एक शार्षक को परिभाषित करने के लिए ही है। व्यक्तित्व विकास के लिए सतर्क व्यक्ति को इसे गंभीरता से समझने और उस पर विचार करने की जरूरत है। अमल तो विचार के साथ ही शुरू हो जायेगा, इसकी गारंटी है। मैं कहना यह चाहता हूं कि वर्तमान का उचित परिणाम भर भले भविष्य है, पर यह तब भी है जब न वर्तमान है और यह तब भी है जब न भूत है। नहीं समझे? जी हां, यदि भविष्य का वजूद है तो उसका भूत और उसका वर्तमान एक अलग प्रकार की ही चीज है। भविष्य कभी बर्बाद नहीं होता, कभी चौपट नहीं होता। हो ही नहीं सकता। बल्कि सब कुछ चौपट हो जाये तो भी जो एकमात्र चीज बची रहती है, वह भविष्य ही है।
आज आप लुट गये, बर्बाद हो गये, आपकी बीवी किसी प्रेमी के साथ भाग गयी, बच्चा खो गया, नौकरी चली गयी, फेल कर गये, संपत्ति पर किसी ने कब्जा कर लिया, आपके पास कुछ नहीं बचा, आप चिल्ला रहे हैं, कराह रहे हैं, तड़प रहे हैं, आपकी आंखों के आगे अंधेरा छाया है, रास्ता नहीं सूझ रहा, वैसी स्थिति में भी मैं आपको दिलासा दिलाता हूं कि संभलिए, आपका भविष्य बचा हुआ है। भविष्य यानी कल।
जी हां, चेतिए, आपका भविष्य बचा हुआ है। कल आयेगा और आपके लिए भी कल आयेगा। वह आपका भविष्य है। आप उसे फिर से संवार सकते हैं, क्योंकि भविष्य बचा हुआ है और अभी उसे आना है। जो नहीं बचा रहने वाला, संवारा तो उसे ही जाता है। तो जब भविष्य ही बचा रहता है तो फिर काहे की भविष्य की चिंता। चिंता तो उसकी की जाती है, जो बचा नहीं रहने वाला। भविष्य तो आखिर तक बचा रहने वाला है तो काहे की चिंता, काहे की फिक्र? काहे का डर, काहे की घबराहट, काहे की भाग-दौड़, काहे की हड़बड़ी-जल्दबाजी , काहे के लिए नैतिक-अनैतिक करने की मजबूरी? काहे की? काहे की??
फिलहाल इतना ही। भविष्य को लेकर बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उससे कुछ और बातें मन में आ रही हैं, व्यक्तित्व विकास के लिए सतर्क व्यक्ति के लिए शायद वह किसी काम आ जाये। इंतजार कीजिए अगली पोस्ट का।


ब्रह्मा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी, धोते वीर कु-अंक भाल का, बहा भ्रुवों से पानी। (दिनकर की पुस्तक - कुरुक्षेत्र - से)

Tuesday, June 23, 2009

हीन भावना से ऐसे उबरें - एक और सुझाव

हीन भावना से ऐसे उबरें पर इलाहाबाद में रहने वाले मेरे एक पत्रकार मित्र के मित्र श्री कुलदीप ने सुझाव दिया है कि हीन भावना से उबरना हो तो जमकर गालियां दो, सभी समस्याएं दूर हो जायेंगी। किसी की बातों को खींचना निश्चित रूप से आदर्श शिष्टाचार की बात नहीं है, पर कुलदीप भाई से माफी के साथ उनकी बातों पर सिलसिला थोड़ा बढ़ाना चाहता हूं। निश्चित ही कुलदीप भाई मजाकिया किस्म के इंसान होंगे और मजाकिया किस्म के इंसान मजाक-मजाक में गाली दे डालते हैं। ऐसा वे इसलिए कर पाते हैं कि वे सामने वाले को जानते हैं और सामने वाला भी उन्हें पहचानता है। इस जान-पहचान का नतीजा होता है कि सामने वाला गालियों का बुरा नहीं मानता।
पर, जिस हीन भावना से उबरने की बात सीरीज में चल रही थी, बाहैसियत उस मिजाज के यदि गाली देने पर अमल किया गया तो यही माना जायेगा कि व्यक्ति हीन भावना से ग्रसित है और उसी के जेरेसाया गालियां बक रहा है। कुलदीप भाई ने बहुत गलत नहीं कहा है। निराशा, हताशा की स्थिति में लोग ऐसा भी करते है।गालियां देते हैं और खासकर सुनाने के अंदाज में गालियां देते हैं। मेरा मानना है कि गालियां बकना हीन भावना से ग्रसित होने का ही परिचायक है, न कि इससे निकलने का उपाय। मेरा मतलब यह है कि यदि आप गाली दे रहे हैं तो यह साबित कर रहे हैं कि आप हीन भावना के शिकार हैं।
मेरा मानना है, गालियां देने से समस्या का निदान नहीं हो सकता। ऐसा कर आप अपनी जुबान तो खराब करेंगे ही, इसके कुछ खतरे भी आपको झेलने पड़ सकते हैं। गाली देने के एवज में आपको उससे भी बड़ी-बड़ी गाली सुननी पड़ सकती है। और बड़ी गाली खाकर आप जिद पर आये, कोई और एक्शन लिया तो मामला मार-पिटाई पर उतर सकता है। इसमें भी खतरा यह है कि यदि आप कमजोर पड़े तो पिट भी सकते हैं। और ख्याल कीजिएगा, गाली देने वाला व्यक्ति जब कहीं पिटता है तो उसे बचाने वाले भी कम ही दिखते हैं। गाली देने वाले को सोसाइटी में कभी अच्छा नहीं माना गया। उल्टे लोग उससे किनारा कर जाते हैं। हीन भावना से उबरने के लिए आप गाली देने लगे तो निश्चित ही उन लोगों के आपसे दूर हो जाने का खतरा है, जो आपके हमदर्द, हमकरीब और हमकदम हैं।
दरअसल, हीन भावना एक तुलनात्मक सोचों वाली मानसिक स्थिति है, जिसमें फंसा व्यक्ति अपनी स्थिति से ज्यादा दूसरों की स्थिति के अध्ययन में उलझकर अपना सर्वस्व चौपट कर रहा होता है। क्या इसका निदान गाली देने से संभव हो सकता है? नहीं, कुलदीप भाई, बिल्कुल नहीं। जरा सोचिए, गाली देने से आपकी स्थिति में क्या फर्क पड़ेगा? जिसकी तुलना से आप हीन भावना से ग्रसित हुए, उस पर क्या फर्क पड़ेगा? मेरा मानना है- कुछ भी नहीं। गाली देकर थोड़ी देर के लिए संतुष्ट भले हो लें, पर यह एक और अवसाद की ओर ले जायेगा। हीन भावना से ग्रसित व्यक्ति के लिए अवसाद की एक और अवस्था खतरनाक ही कही जा सकती है। इसलिए गाली नहीं। गाली दुर्जनता की पहचान है, और हीन भावना से ग्रसित व्यक्ति को इस राह पर आगे बढ़ने की सलाह कतई नहीं दी जा सकती।
फिलहाल कुलदीप भाई को धन्यवाद और सबसे ज्यादा धन्यवाद उस पत्रकार मित्र को , जिन्होंने कुलदीप भाई की प्रतिक्रिया मेरे मेल पर भेजी और एक और मसले पर विचार करने का अवसर दिया।

व्यक्ति यदि साहस दिखाये तो बड़े से बड़े लक्ष्य को हासिल कर सकता है।