Sunday, May 1, 2016

सुने बजरंग बली, सुनाए गुलाम अली

पहली पेशकश ही थी - मैंने लाखों के बोल सहे, सितमगर तेरे लिए...

संकट मोचन का दरबार और संगीत का महाकुंभ। मंगलवार को छह दिवसीय संकट मोचन संगीत समारोह की पहली निशा के सिरमौर थे गजल सम्राट पाकिस्तानी फनकार गुलाम अली। उनकी पहली पेशकश ही यह बता रही थी कि इस दरबार में हाजिरी लगाने के लिए उन्होंने कितनी बाधाएं पार कीं। राग विहाग में दादरा पेश करते जब उनके लब से 'मैंने लाखों के बोल सहे, सितमगर तेरे लिए...' का स्वर फूटा, मंच के सामने बैठा हर श्रोता करतल ध्वनि कर उठा। इसी के साथ संकट मोचन मंदिर का पूरा परिसर जय सियाराम व हर हर महादेव के जयकारे से गूंज उठा। जयकारे पर गजल सम्राट की मुस्कान गहरी हो गई और उनका सुर लय के गहरे सागर में डूब गया।
मंच पर आते ही श्रोताओं में शुरू कुछ गहमागहमी को गुलाम अली ने अपनी गुजारिश से शांत करा दिया। गुजारिश - मैं खुद को सबसे छोटा समझता हूं, मेरी बातें गौर से सुनें। अभी लोग संभलते कि फनकार ने एक शेर पेश कर दिया - वो उन्हें याद करें, जिसने भुलाया हो कभी, हमने न भुलाया, न कभी याद किया। अभी तालियों की गूंज थमी भी नहीं कि उनका दूसरा नजराना पेश हो चुका था - रोज कहता हूं भूल जाऊं उसे, रोज ये बात भूल जाता हूं। लोग वाह-वाह कर उठे और राग विहाग में शुरू हो गया उनका दादरा।
रागिनी पहाड़ी में दूसरी प्रस्तुति से पहले उनके शेर, अंदाज अपने देखते हैं आईने में वो, और ये भी देखते हैं कोई देखता नहीं... को भी श्रोताओं की ओर से खूब समर्थन मिला। तालियों की गूंज के बीच पेशकश के बोल सामने थे - दिल में इक लहर सी उठी है कि...  कुछ तो नाजुक मिजाज हैं हम भी, और ये शौक नया है भी... सो गए लोग इस हवेली के, एक खिड़की मगर खुली है भी...।
क्रीम कलर की शेरवानी और चेहरे पर गंभीर मुस्कान के साथ उन्होंने घोषणा की कि मेरी तीसरी पेशकश वह गजल है, जो खुद मुझे पसंद है और जिसे मैंने आशा भोंसले के साथ भी गाया है। बोल थे - गए दिनों का सुराग लेकर, किधर से आया, किधर गया वो...। और इसी के साथ संपन्न हो गया उनका कार्यक्रम, मगर लोग मानने को तैयार ही नहीं थे। आवाज आ रही थी, तेरे शहर में... वाला सुनाकर जाइए, तेरे शहर में वाला सुनाकर जाइए...।
(२७ अप्रैल २०१६ को वाराणसी जागरण के पहले पेज पर प्रकाशित)

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