Thursday, January 8, 2009

नक्कारेपन का परिणाम ही तो है लूट, दंगा, खून और इससे सनी राजनीति

श्री सुरेश चंद्र गुप्ता जी ने मेहनत पर कुछ और विचार रखने को प्रेरित किया है। उनकी जिज्ञासा यह जानने की है कि देश की राजनीति में चल रही 'गंदी राजनीति' का जवाब किस तरह से मेहनत हो सकती है। लेखों की यह सीरीज व्यक्तित्व विकास पर लिखी जा रही है, जिसके तहत सार्वजनिक व्यवहार में लागू किये जाने वाले बिन्दुओं पर विचार किया जा रहा है। यहां राजनीति से मतलब व्यक्ति विशेष के खिलाफ होने वाली गुटबंदी से था और श्री गुप्ता जी ने ठीक ही कहा, यह कार्यस्थल पर होने वाली घोर राजनीति से संबंधित था। बताया यह गया था कि ऐसी राजनीति से निपटने का आदमी के पास मेहनत ही सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है। पर, श्री सुरेश गुप्ता जी ने जो मसला उठाया है, वह भी कम मौजूं नहीं है। यह सवाल आज एक-एक व्यक्ति के लिए विचार करने योग्य है और इसका निदान एक थोड़े और छोटे से सुझाव से कतई नहीं दिया जा सकता। इस बारे में मैं जो कहना चाहूंगा, वह सिर्फ इतना है कि यह देखने से पहले कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक नेता अपनी मनमानी आखिर कैसे चला पा रहा है, यह देखना क्या जरूरी नहीं है कि वह मनमानी चलाने की स्थिति में आखिर कैसे पहुंच कैसे जाता है, उसे वहां तक पहुंचा कौन देता है? क्या यह कहीं किसी के नक्कारेपन को नहीं उभारता? जी हां, मेरा साफ इशारा वोट डालने वाली जनता की ही ओर है। मुझे याद है, चारा घोटाला में जब लालू प्रसाद यादव जेल जा रहे थे तो उनके समर्थक (अधिकतर यादव जाति के लोग) उन्हें गुनाहगार मानते ही नहीं थे। वैसे लोग खुलेआम कहते चल रहे थे कि जगन्नाथ मिश्र जब पटना का गांधी मैदान, रेलवे स्टेशन बेच सकते हैं और करोड़पति हो सकते हैं तो लालू ने थोड़ा-बहुत घोटाला ही कर लिया तो कौन सी बड़ी आफत आ गयी? मौका मिला है तो खायेगा नहीं तो क्या करेगा?
आप देख सकते हैं गुप्ता जी, अपराधी चुनाव में खड़ा हो रहे हैं और जीत रहे हैं। जीत ही नहीं, गद्दी भी पकड़ते जा रहे हैं। तो जीतने के बाद वे क्या करेंगे? वे वही कर रहे हैं, जो उनकी प्रकृति है, प्रवृति है। तो उन्हें जीत की दहलीज पर पहुंचाने वालों को क्या कहा जाय? क्या उन्हें परिश्रमी माना जायेगा, मेहनती माना जायेगा, उद्यमी माना जायेगा? गुप्ता जी, पूरी कौम में नक्कारापन बज रहा है, उसी का परिणाम है-लूट-दंगा-खून और इन सब से सनी आज की राजनीति व राजनेता। लोगों को अपना लक्ष्य तय करना होगा, अपना श्रम तय करना होगा और उस पर मेहनत करनी होगी। इतना ही नहीं, मेहनत की रोटी खाने का संकल्प लेना होगा। तभी उपजेगी ईमानदारी और तभी अस्तित्व में आयेगा अनुशासन। फिलहाल राज्य, सत्ता औऱ श्रम पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध रचना कुरुक्षेत्र से कुछ पंक्तियां पेशे खिदमत है, मुलाहिजा फरमाइए।
एक
छिपा दिये सब तत्व
आवरण के नीचे ईश्वर ने
संघर्षों से खोज निकाला
उन्हें उद्यमी नर ने।

दो
ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में
मनुज नहीं लाया है
अपना सुख उसने अपने
भुजबल से ही पाया है।

तीन
प्रकृति नहीं झुकती है
कभी भाग्य के बल से
सदा हारती वह मनुष्य के
उद्यम से, श्रमजल से।

चार
नर समाज का भाग्य एक है
वह श्रम, वह भुजबल है
जिसके सम्मुख झुकी हुई
पृथिवी, विनीत नभ तल है।

पांच
श्रम होता सबसे अमूल्य धन
सब जन खूब कमाते
सब अशंक रहते अभाव से
सब इच्छित सुख पाते।

छह
राजा-प्रजा नहीं कुछ होता,
होते मात्र मनुज ही,
भाग्य लेख होता न मनुज को
होता कर्मठ भुज ही।
फिलहाल इतना ही। व्यक्तित्व विकास पर अभी चर्चा जारी रहेगी। जैसा कि पिछली बार भी कहा गया था, अगली पोस्ट में सकारात्मक सोच पर ही विचार पेश किये जायेंगे।
भूख इंसान को गद्दार बना देती है।

3 comments:

  1. अच्छा लगा, लिखते रहिए। सकारात्मक सोच पर आपके आलेख का इंतजार है। - अनोज शुक्ला, अजमेर, राजस्थान।

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  2. bilkul sahi likhaa aapne aisi chetna ko jagaaye rakhiye

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  3. accha likha hai ..likhte rahiye....

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