Monday, November 9, 2009

सब जज्बे की बात

व्यक्तित्व विकास पर चल रही सीरीज का यह पचासवां आलेख है। मेरे लिए तो यह बस एक आश्चर्य की ही बात है कि मैंने एक ख्याल पर्सनालिटी डेवलपमेंट पर उनचास लेख लिख दिए और पचासवां लिखने जा रहा हूं! क्या लिखूं यह सवाल नहीं है, न ही यह सवाल है कि कैसे लिखूं? सवाल यह है कि कुछ और अच्छा लिखूं, उनचासों से अच्छा। तो इसके पहले कि मैं इस हाफ सेंचुरी पर बातें आगे बढ़ाऊं, यह जरूरी है कि इन आलेखों को पढ़ने वालों और इन्हें लिखने के लिए प्रेरित करने वाले सभी हमकदम, हमख्यालों को बधाई दे लूं। आप सभी मेरी शुभकामनाएं कबूल करें।

व्यक्तित्व विकास पर कुछ अच्छा लिखने के लिए सोचों की जेरेसाया जो एक शब्द मेरे जेहन में गूंजा, वह शब्द था - जज्बा। मुझे लगता है कि व्यक्तित्व विकास के प्रति सतर्क व्यक्ति जो भविष्य संवारने के लिए भी संवेदनशील हों, उनके लिए इस शब्द का बड़ा महत्व है। आपका जज्बा आपको आपके हर कदम पर ऊंचा उठाता है, नीचे गिराता है। चाहे पूज्य बापू महात्मा गांधी हों, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू हों, डा. राजेन्द्र प्रसाद हों या फिर इंदिरा, पटेल जेपी ही हों। टाटा, बिड़ला की ही बात कर लें। उनकी मिसालें इसलिए आज धरोहर हैं कि वे एक जज्बा रखने वाले लोग थे। अपने जज्बों के प्रति निष्ठा भाव से समर्पित रहने वाले लोग थे।

मेरे एक साथी हैं। उन्हें एक महत्वपूर्ण पद पर विराजमान कर दिया गया। कोई भी पद महत्वपूर्ण इसलिए ही होता है कि वहां का काम महत्वपूर्ण होता है। हां, उस महत्वपूर्ण पद पर विराजमान व्यक्ति के सामने कुछ ऐशपरस्ती के भी मौके भी जरूर होते हैं। मगर, ऐशपरस्ती के मौके पद की महत्ता को बढ़ाने के लिए होते हैं, न कि उसमें डूबकर पद की महत्ता को भूल जाने के लिए। जज्बे का यहीं महत्वपूर्ण रोल हो जाता है। काम के प्रति आपका जज्बा बना रहा तो पद पर आपके बने रहने की संभावना बनी रहेगी और इसी के साथ बनी रहेगी उस पद से जुड़ी रहने वाली ऐशपरस्ती।

अब साथी ऐशपरस्ती में डूब गए। काम का दिन-ब-दिन कबाड़ा निकलने लगा। एक महीना बीता, दो महीना बीता। तीसरे महीने तो जिन्होंने उन्हें उस कुर्सी पर बिठाया था, उन्होंने ही टिप्पणी शुरू कर दी। साथी टिप्पणी झेल रहे थे और इधर-उधर प्रति टिप्पणी करते चल रहे थे। अब एक समय ऐसा आया कि बॉस बदल गया। साथी की ऐशपरस्ती चलती रही। जब उनसे काम खोजा जाने लगा तो वे घबरा गए। उनका घबराना यह बताता था कि काम के प्रति उनका जज्बा खत्म हो चुका था। नतीजा, उन्हें पद से भी पहले ऐशपरस्ती खोनी पड़ी। बाद में तो वे पद बचाने के लिए मशक्कत कर रहे थे। यह मशक्कत संस्थान बदलने के बाद ही पूरी हुई। एक ख्वाब जो ख्वाबों में ऊंचा मुकाम चढ़ गया था, अंजाम तक पहुंचने से ही पहले ध्वस्त हो गया। कारण रहा जज्बे की कमी।

फिलहाल इतना ही। व्यक्तित्व विकास के प्रति सतर्क व्यक्ति के लिए भविष्य संवारने काटिप्स तलाशती रपटों का सिलसिला अभी जारी रहेगा। धन्यवाद।

सर्वाधिक पत्थर उसी पेड़ पर फेंके जाते हैं, जो फलों से लदे होते हैं।

6 comments:

  1. वाह भई, बधाई हो। पचासवां आलेख पर। लेकिन आपके मिजाज को देखकर तो ऐसा लगता है कि आप शतक पूरा करेंगे। आपके अगले आलेखों का इंतजार रहेगा। एक बार फिर, सुंदर लेखन के लिए आपको बधाई।

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  2. अभी वक्त के इंतहान और भी हैं, मोहब्बत के आगे जहां और भी हैं....

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  3. बढ़िया, बधाई हो।

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  4. अब तो किताब आ जानी चाहिए।

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  5. सब से पहले तो आप को हाफ सेंचुरी की बधाई, ओर फ़िर इस सुंदर लेख के लिये धन्यवाद

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  6. Your effort should be appriciated whole heartedly. Kip it up. Time is comming. sincerity and sustainablity can not be avoided for long time. All the best my darling.

    satish

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