Saturday, May 2, 2009

एक बार में एक ही धंधा करें

यह जमशेदपुर और कुछ दिनों पहले की बात है। वहां त्रिदंडी स्वामी आये थे। उस दौरान उनका मौन व्रत चल रहा था। बातें स्लेट पर ही लिखकर करते थे। काफी मशक्कत के बाद उनसे रूबरू होने का मौका मिला। मेरा उनसे एक ही सवाल था। मैंने उनसे पूछा- बाबा, शास्त्रों में लिखा है कि एक बार भगवान का नाम लेने से जीवन कृतार्थ हो जाता है, सफल हो जाता है। हम तो बार-बार भगवान का नाम लेते हैं, फिर भी कष्टों में पड़े हुए हैं। बाबा मुस्कराये, बोले, सॉरी, स्लेट पर लिखे- शास्त्रों पर आपने भरोसा कहां किया! मैभौचक्क। बाबा ने आगे लिखा- शास्त्रों पर भरोसा करते तो बार-बार नाम नहीं लेते। और जब जिस चीज पर भरोसा नहीं, उसका फल आप कैसे पा सकते हैं? बाबा के दृष्टांत से मैं कोई धार्मिक अंधविश्वास की विवेचना नहीं करने जा रहा। पर, व्यक्तित्व विकास के लिए जो सार्थकता इसमें छिपी है, बस उसी को उद्धृत करना चाहता हूं। उनके कहने का मतलब था - विश्वास बड़ी चीज है। व्यक्तित्व विकास के लिए इसे ऐसे समझें कि अपना व्यक्तित्व तो विश्वास भी सबसे पहले अपने ऊपर। यानी आत्मविश्वास। जी हां, यह बहुत जरूरी है। जिस आदमी को खुद के ऊपर विश्वास नहीं होगा, वह कैसे और क्योंकर आगे बढ़ पायेगा। है न विचार करने के लायक?

अब एक दूसरे बाबा संत जगदीश गौतम उर्फ जयमंगलाबाबा की बात सुनिये। जब मैं ग्रेजुएट करने के बाद गांव में बेरोजगारी का दिन गुजार रहा था या यूं कहिए कि रोजगार की तलाश में लगा था, उसी दौरान यह यायावर बाबा वहां आये। उनसे थोड़ी देर की मेरी जान-पहचान हुई। बाद में संयोग ऐसा हुआ कि पत्रकारिता और अखबारों की नौकरी के दौरान जहां-जहां रहा, वहां-वहां वे यज्ञ अनुष्ठान के लिए पहुंचे और एक बुजुर्ग से मिलने की हैसियत से उनसे मेरी लगातार , कुछ-कुछ वक्फों के बीच में, मुलाकात होती रही। कभी जमशेदपुर, कभी अमृतसर, कभी वैशाली तो कभी मुजफ्फरपुर। अभी हाल ही में उन्होंने मुजफ्फरपुर के शेरपुर में एक विराट यज्ञ कराया है। मेरा मानना है कि जीवन की व्यस्तताओं के बीच मानव को समय निकालकर बड़े जनों, गुरु जनों के साथ बैठना चाहिए और निर्विवाद रूप से जीवन के मसलों पर चर्चा करनी चाहिए। कौन जाने, कहां, किस वेश में मिल जायें भगवान...।

तो, अभी थोड़े दिनों पहले मैंने उनसे सवाल ठोका- बाबा, आदमी कभी इस धंधे में, कभी उस धंधे में लगा रहता है, विफल होता रहता है। उसे शिकायत रहती है, बास से, संस्थान से, नौकरी से। ऐसे में क्या करे आदमी? बाबा ने ऐसे तो बहुत सारी बातें कहीं, पर उनकी दो बातें यहां लिखे जाने के लायक है। उनके कहने का सार यह था कि आदमी पहले अपना लक्ष्य तय करे। यह तय करे कि उसे करना क्या है? यह पता हो जायेगा कि उसे करना क्या है तभी उसकी सारी इंद्रियां उस दिशा में कार्य करना शुरू करेंगी और उसे सपोर्ट करेंगी। लक्ष्यहीनता की स्थिति में परेशानी अवश्यसंभावी है। परेशान आदमी का लहजा शिकायती हो जाता है। पहले तो वह दूसरों पर दोष देता चलता है, धीरे-धीरे वह खुद को दोष देने लगता है और अंत में इस आदत से उसका पूरा जीवन चौपट होकर रह जाता है। दूसरी बात, विफलताएं लक्ष्यहीन व्यक्ति को ही परेशान करती हैं। जिसने लक्ष्य तय कर लिया, इसका मतलब लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उसने कमर भी कस ली। कमर कसने का मतलब वह आने वाली परेशानियों से दो-चार होने के लिए तैयार हो गया। फिर विफलताएं उसे परेशान नहीं करतीं। जितना वह परेशान होता है, लक्ष्य के प्रति उसका अटैंशन उतना ही बढ़ जाता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि आदमी एक बार में एक ही काम करे। इससे काम की संपन्नता निश्चित हो सकती है। एक समय से कई धंधे अपने हाथ में लेने से विफलता और निराशा के हाथ लगने की संभावना बढ़ जाती है। फिलहाल इतना ही। व्यक्तित्व विकास पर अभी चर्चा जारी रहेगी।

जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब हमें किसी की जरूरत नहीं होती, पर जीवन में ही कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं, जब जरूरत पड़ने पर हमें एक भी व्यक्ति नहीं दिखता।

2 comments:

  1. बड़े दिनों बाद यहां नजर आए शुक्ला जी। आपकी अनुपस्थिति खलती रही। अच्छा लिखा है।

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