Thursday, November 13, 2014

खबर साफ्ट तो हेडिंग हार्ड - 1

खबरों की जान है शीर्षक - 5

आइए लेते हैं खबरों की खबर - 9

आसान है साफ्ट खबरों के लिए हार्ड हेडिंग लगाना, बहुत ही आसान है। शर्त सिर्फ एक ही है कि आपको उस खबर में डूबना होगा, डूबना होगा, खबर की भावनाओं को आत्मसात करना होगा। ऐसा कौन कर सकता है, सवाल यह भी है। ऐसा नहीं है कि आपको कहा कि आप खबर में डूब जाएं, आप डूब गए और हेडिंग निकल आई। कभी-कभार तो ऐसा हो सकता है और परिणाम काफी सुखदकारी हो सकता है, पर आपकी लेखनी लगातार ऐसे शीर्षक उगलती रहें, इसके लिए यह भी जरूरी है कि आप लगातार अध्ययनशील हों, भ्रमणशील हों, बहुत सारा प्यार का जज्बा हो तो अंदर से गुस्सा भी फूटे। और यह सब कुछ हुआ तो हार्ड खबर की साफ्ट या साफ्ट खबर की हार्ड हेडिंग निकलने में देरी नहीं होने वाली। खबरों की जान हैं शीर्षक के पहले आलेख में मैं जिन तीन कहानियों और उनके शीर्षकों क्रमशः मुखियों की फौज मार रही मौज, पछुआ ने लीची को लूटा व सपने चूमेंगे आसमान का जिक्र कर चुका हूं, वे यही हैं, साफ्ट खबर की हार्ड हेडिंग। आइए, कुछ और उदाहरणों से समझते हैं, निश्चित रूप से तस्वीर साफ होगी।

उदाहरण एक - विश्व कैंसर दिवस पर खबर बननी थी। संवाददाता ने जो खबर दी, वह आंकड़े पेश कर रही थी। साल दर साल बढ़ते कैंसर मरीजों के। खबर यह भी बता रही है कि किस-किस प्रकार के कैंसर होते हैं और इलाका विशेष में किस प्रकार का कैंसर पनप रहा है। फोकस क्यों पर भी था। सबसे बाद में थी उस जिले में कैंसर की जांच और इलाज की व्यवस्था का हाल। पूछने पर बताया गया कि कैंसर तो लाइलाज ही होता है। अब इसके लिए क्या और कैसे खबर बनाई जाए। आंकड़ों की बात है और बात यह है कि इस इलाके में भी यह रोग बढ़ रहा है। खबर में डूबने की बात थी और डूबा मन कह रहा था कि सारी बातें किस्तों में छप चुकी हैं। इसकी तो कोई हार्ड हेडिंग होनी चाहिए, व्यवस्था पर चोट करने वाली हेडिंग होनी चाहिए, हेडिंग ऐसी होनी चाहिए कि कल अखबार में दिखे तो सिर्फ यही। कल शहर की जुबां पर चर्चा हो तो सिर्फ इसी एकमात्र हेडिंग की।

शुरू हुई मशक्कत। संवाददाता के साथ ब्रेन स्टार्मिंग। पूछा, कैंसर के इतने रूप आपके इलाके में पसर गए हैं, क्या यह बात सिर्फ आपको मालूम है? जवाब - नहीं, महकमे के सभी अधिकारी इस बात को जानते हैं, आंकड़े तो विभाग से ही लिए गए हैं। सवाल - अच्छा, तो उन्होंने क्या किया? जवाब - क्या करते, बस बातें करते हैं, करना तो सरकार को है। सवाल - सरकार को यानी? जवाब - सर, राजधानी में कैंसर अस्पताल है, यहां तो बस एक यूनिट बनाकर उसे कैंसर यूनिट का नाम दे दिया है। यहां जांच की तो सुविधा ही नहीं है, इलाज कहां से करेंगे? सवाल - तो क्या करते हैं अस्पताल में? जवाब - सही मायने में देखा जाए सर तो मरीजों को इलाज के नाम पर बरगलाते हैं, उनका समय खराब करते हैं और बात जब बूते से बाहर हो जाती है तो मरीज को राजधानी रेफर कर देते हैं।

रिपोर्टर की बात भयानक थी। खबर निश्चित रूप से साफ्ट थी। कैंसर दिवस विशेष पर छपने वाली थी, मगर नेचर हार्ड हो रहा था, सो हेडिंग भी हार्ड बनी। क्या? थोड़ी देर सोचिए, सूझे तो ठीक, न सूझे तो अगली लाइन पढ़िए। डाक्टरों का मरीजों को बरगलाकर टाइम खराब करने वाली बात हैमर कर रही थी, यही पाठकों को बताने को विवश भी कर रही थी। जो डाक्टर मरीज के अंतिम क्षणों में कह रहे थे, अखबार उसे पहली लाइन में ही कह देना चाहता था। हेडिंग बनी - कैंसर है, भागिए पटना। इसकी दूसरी हेडिंग थी- इलाज तो छोड़िए यहां जांच की भी नहीं है व्यवस्था। खबर छपी। वह दिन था, अखबार था, व्यवस्था थी, इलाके का पाठक वर्ग था। सब एक दूसरे में समाहित। एक ही आकर्षण - कैंसर है तो भागिए पटना।

बहुत दिनों के बाद लिखा, लेकिन जहां तक मैं समझता हूं, खबर साफ्ट तो हेडिंग हार्ड, के तहत प्रेरक शुरुआत हो गई है। इस पर अभी और बातें होंगी। उदाहरण दो के साथ आएगी अगली पोस्ट, इंतजार कीजिए। 

Friday, April 4, 2014

खबर हार्ड तो हेडिंग साफ्ट - 3

खबरों की जान हैं शीर्षक -4

आइए लेते हैं खबरों की खबर - 8
इसके पहले कि बात आगे बढाऊं, आपको एक शीर्षक सुझाता हूं। इसे जरा उस खबर पर फिट करके देखिए, जिससे बात शुरू हुई और इतनी दूर तक निकल आई। शीर्षक है - पूछ रहीं मासूम आंखें, मेरा गुनाह क्या? बात हार्ड खबर दिनदहाड़े युवक की हत्या के साफ्ट शीर्षक लगाने की थी। अब इस शीर्षक को हत्या की खबर पर फिट कर देखिए। मासूम आंखें उस युवक की पत्नी की हो सकती हैं, उसके बूढ़े माता-पिता की हो सकती हैं, उसके बच्चों की हो सकती हैं। बस, दिनदहाड़े हुई हत्या की खबर लिखने से पहले आपको सिर्फ इतना करना होगा कि उसके उन परिजनों के बारे में पता करना होगा, उनसे मिलना होगा और उनसे बात करनी होगी। इस खबर की सब हेडिंग बनाइए - बदमाशों ने दिनदहाड़े छीना मासूम के सिर का साया, हत्यारों ने छीना बुढ़ापे का सहारा, उजाड़ दिया सुहाग, सुहागिन के सपने चकनाचूर आदि आदि..। 


गोरखपुर की बात है। अगवा कर एक लड़की से सामूहिक बलात्कार किया गया। बाद में लहूलुहान हालत में उसे फेंक दिया गया। लड़की जब अस्पताल में भर्ती हुई तो खबरनबीशों को इसकी जानकारी मिली। अब शुरू हुई खबर लिखने और खबर के पीछे की खबर ढूंढ़ने की मशक्कत। फोटोग्राफर ने एक अच्छा काम किया। उन्होंने बेड पर पड़ी लड़की के चेहरे का एक ऐसा क्लोजअप फोटो लिया, जिसमें लड़की की आंखें पूरी व्यथा को न केवल खोल रही थीं, बल्कि देखने वाले को सहानुभूति और गुस्सा दोनों से भर रही थीं। सवाल था, इस हार्ड खबर का साफ्ट शीर्षक क्या हो? समीकरण वही फिर सामने था, हेडिंग साफ्ट होनी चाहिए। ...और शीर्षक लगा - आंखों में सवाल, मेरा लड़की होना गुनाह? यकीन कीजिए, कल जिसने भी शीर्षक पढ़ा, रोमांचित हो गया, फीडबैक यही था।

शहर में लूट की वारदात हुई। लुटेरों ने दंपती को बांधकर इत्मीनान से डेढ़ घंटे तक घर को खंगाला और नकदी-जेवर के साथ जरूरी टीवी-फ्रिज, वाशिंग मशीन, गैस स्टोव जैसे घरेलू सामान भी ले गए। मध्यम वर्ग के इस परिवार ने कई वर्षों में जरूरी खर्चे काट-काट कर और एक-एक कर इन्हें जुटाए थे। निश्चित रूप से यह चोरी उन पर भारी पड़ गई, वे कंगाल हो गए। इस हार्ड खबर की भी साफ्ट हेडिंग ही निकली और सच में लाजवाब रही, प्रतिद्वंद्वियों को लाजवाब कर गई। शुरू में संवाददाता ने इसकी हार्ड हेडिंग ही लगाई थी, जो जम तो रही थी मगर दूसरे अखबारों से आगे निकलने का माद्दा नहीं दिखा रही थी। बातें शुरू हुईं तो बात पकड़ में आई। बात उस घर की महिला की थी, जो चोरी की घटना के बाद हर किसी से कह रही थी। क्या? जो कह रही थी वही शीर्षक बन गया। आप भी सुनिए - अब कहां से खरीदूंगी टीवी, कैसे पकेगा खाना। महिला का अगला वाक्य सब हेडिंग बन गई - डेढ़ घंटे में लुटेरों ने कंगाल बना दिया।

मुझे लगता है, उदाहरण कई हो गए, बात भी समझ में आ गई होगी। यानी हार्ड खबर की साफ्ट हेडिंग हार्ड खबर को और हार्ड बना देती है, आपको प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे ले जाती है और पढ़ने वालों को पूरी खबर पढ़ने के लिए पन्ने पर रोक देती है। रोक देती है नहीं? यदि मानते हैं कि रोक देती है तो आप भी शुरू कीजिए हार्ड खबर की साफ्ट हेडिंग लगाना। इस कला में आप रातोरात सिद्ध नहीं हो पाएंगे। कोई रातोंरात होता भी नहीं। लेकिन, यदि मानसिकता बन आई तो मेरा दावा है कि इस कला में पारंगत हो जाने में आप भी खुद को नहीं रोक पाएंगे। अब अगली चर्चा होगी - कैसे बनाते हैं साफ्ट खबर की हार्ड हेडिग। 

Wednesday, February 26, 2014

खबर हार्ड तो हेडिंग साफ्ट - 2

खबरों की जान हैं शीर्षक -3
आइए लेते हैं खबरों की खबर - 7

सवाल है कि हत्या, लूट और बलात्कार जैसी घटनाओं की हेडिंग साफ्ट कैसे की जाए?  उदाहरण से समझिए। एक युवक की दिनदहाड़े बदमाशों ने बीच बाजार गोली मार कर हत्या कर दी। एक ने हेडिंग बनाई -दिनदहाड़े बीच बाजार युवक की हत्या, दूसरे ने लिखा - सरेआम गोलियों से भूना, तीसरे ने शीर्षक बनाया - पुलिस का इकबाल ध्वस्त, सरेआम खून, चौथे ने लिखा - हत्यारों का राज!, पांचवें ने हेडिंग बनाई - बाइक से उतरे, पिस्तौल सटाई और दागने लगे गोलियां। ये सब हार्ड खबर की हार्ड हेडिंग है। आपको नहीं जंचती। आपके सामने सवाल है साफ्ट हेडिंग लगाने का? क्या लगाएं?

इसी परिप्रेक्ष्य में एक और उदाहरण पर  गौर फरमाइए। शाम में चार बजे एक सूचना आती है कि शहर से बीस किलोमीटर की दूरी पर ड्राइवर की लापरवाही से ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई। अब सारा फोकस ड्राइवर पर। थोड़ी देर बाद सूचना अपडेट हुई कि ड्राइवर नशे में था। फिर अपडेट हुई कि ड्राइवर ४८ घंटों से लगातार ड्यूटी पर था। फिर अपडेट हुई कि सिग्नल था नहीं औऱ ड्राइवर ने ट्रेन रोकी नहीं। सारा फोकस ड्राइवर की लापरवाही पर हो गया और हेडिंग उसी के इर्द गिर्द बन गई। रिपोर्टर खुश, काम हो गया। डेस्क का साथी खुश, मिल गई एक हार्ड खबर। कल संपादक भी खुश कि खबर छूटी नहीं।

लेकिन, एक संवाददाता ऐसा निकला जो अपडेट होती सूचनाओं पर टिका बैठा नहीं रहा। वह पहुंच गया स्पाट पर, मिल लिया ड्राइवर से, बातें कर लीं उन लोगों से जो स्पाट पर मौजूद थे। अब उसकी हेडिंग थी - बचा ली ग्यारह मासूमों की जान। दरअसल उसे पता यह चला कि ड्राइवर ने क्रासिंग पर फंसे उस टेम्पो को देख लिया था, जिसमें ग्यारह स्कूली बच्चे सवार थे। उसे पता चल गया था कि ड्राइवर न तो नशे में था, न ही उसने किसी नियम को तोड़ा था।

अपना सवाल फिर वही है। खून खराबे वाली हार्ड खबर की हेडिंग साफ्ट कैसे बने? ट्रेन दुर्घटना का विश्लेषण गवाह है, रिपोर्टर को मेहनत करनी होगी। टेक्स्ट बटोरना होगा। गहन अन्वेषण करना होगा और खबर के साथ दिल से जुड़ना होगा। हेडिंग तो बनेगी ही, कैसे नहीं बनेगी? आखिर बात तो पूरी हो, सूचना तो पूरी हो, मालूमात तो पूरे हों। ये सब होंगे तभी तो बनेगी कुछ संभावना।

इसके पहले कि दिनदहाड़े हत्या की कुछ साफ्ट हेडिंग सुझाऊं, एक और दृष्टांत पर गौर फरमाइए। फिर बात ट्रेन की। वक्त भी वही रखिए, यानी शाम के चार बजे। पता चलता है कि राजधानी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गई और करीबन डेढ़ सौ लोग मारे गए। अब लड़ाई शुरू हो गई मारे जाने वालों की संख्या ज्यादा से ज्यादा दिखाने की। कोई अखबार लिखता है १५० मरे, कोई लिखता है १५८ तो कोई १७५। जाहिर है, राजधानी दुर्घटनाग्रस्त तो वे लिखेंगे ही। अब जरा सोचिए, घटना शाम चार बजे की है। यदि आप अखबार के लिए खबर लिख रहे हैं तो वह बहुत जल्दी भी वह पाठक के पास पहुंची तो कम से कम पंद्रह-सोलह घंटे तो गुजर ही चुके होंगे। मान लेते हैं, किसी रिपोर्टर को यह भी ख्याल आया। अब चूंकि उसका फोकस मृतकों की संख्या है, इसलिए वह देर रात तक अस्पताल खंगालेगा और उसमें दो चार की और बढोतरी कर लेगा। काम खत्म, खबर कवर?

लेकिन, एक भाई ऐसा निकला जो  यह पता करने लगा कि राजधानी एक्सप्रेस आखिर दुर्घटनाग्रस्त हुई तो कैसे हुई? राजधानी का मतलब अतिरिक्त विभागीय सतर्कता, अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था। अब उसे पता चला कि यह विभागीय कोई बड़ी लापरवाही थी, उसे पता चला कि यह बड़ी नक्सली साजिश थी और उसकी हेडिंग बन गई बड़ी लापरवाही या बड़ी नक्सली साजिश। आप स्वयं कल्पना कर सकते हैं कल अखबार कौन सा भीड़ में अलग दिखेगा, उस भीड़ से कौन सा अखबार उठेगा।

अपना सवाल तो फिर वही है। उस दिनदहाड़े खून की साफ्ट हेडिंग क्या हो? उम्मीद है कुछ हेडिंग आपको सूझने लगी होगी। नहीं, तो बातें अगली पोस्ट में।

Thursday, February 20, 2014

खबर हार्ड तो हेडिंग साफ्ट

 खबरों की जान हैं शीर्षक - 2
आइए लेते हैं खबरों की खबर -6


जमशेदपुर की बात है। पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में राजनीति की दिशा और दशा पर हफ्तेवार पूरा पेज लिखने वाले बुजुर्ग पत्रकार केदार महतो (अब इस दुनिया में नहीं हैं) कहा करते थे कि यदि खबर हार्ड हो तो शीर्षक साफ्ट बनाइएगा और खबर साफ्ट हो तो शीर्षक को हार्ड कर दीजिएगा। हमलोग उन्हें चाचा कहा करते थे। जब पूछता कि चाचा, जरा विस्तार से बताइए तो कहते खुद सोचिए। बड़ी मुश्किल थी, कोफ्त भी होती थी। पहले तो बात समझ में ही नहीं आई। पर, इतना जरूर हुआ कि दिमाग चलने लगा। जब कभी हार्ड खबर लेकर बैठता तो साफ्ट हेडिंग सोचने लगता। जब कभी साफ्ट खबर लेकर बैठता तो हार्ड हेडिंग सोचने लगता। अजीब मुसीबत थी। आप विश्वास करिए, यह मशक्कत हर खबर की हेडिंग के लिए होने लगी। और नतीजा बड़ा चमत्कारिक था। अखबार चमकने लगा था।

तो मुद्दे पर आएं। क्या हो हार्ड खबर की साफ्ट हेडिंग और साफ्ट खबर की हार्ड हेडिंग? अमूमन होता यह है कि जब किसी अधिकारी या विभाग की कलई खोलती हार्ड खबर लिखी जाती है तो संवाददाता या डेस्क के साथी हेडिंग को भी हार्ड ही रखते हैं। लेकिन, जरा रुकिए, सोचिए..। क्या इसकी कोई साफ्ट हेडिंग हो सकती थी जो तीर की तरह सीधे दिलोदिमाग में घुस जाती? सोचिए कि क्या यह खबर किसी विभाग या किसी अधिकारी के भ्रष्टाचार की कलई खोलती पहली खबर बन रही है? क्या वह पहला विभाग है या पहला अफसर है जो भ्रष्टाचार में लिप्त है? तो सोचिए कि आप इस खबर का शीर्षक हार्ड बनाने पर क्यों तुले हैं?

खबर में मुख्य रूप से तीन प्राथमिकताएं ही होती हैं। पहली सूचित करना। दूसरी सावधान करना। तीसरी संवाद करना। इन तीन प्राथमिकताओं पर गौर कीजिए। यह हार्ड और साफ्ट की परिभाषा भी समझा रही हैं। मेरा आग्रह तीसरी प्राथमिकता पर है। संवाद की श्रृंखला ही आपको इस फर्क को समझाने लगेगी। सवाल आएगा कि इस खबर को लेकर संवाद किससे? किससे?? फिर सोचिए, इस खबर की बाबत आप संवाद किससे कर रहे हैं। क्या उस आम पाठक से जो अखबार खरीदकर पढ़ रहा है? क्या उस विभाग के आला अधिकारी या सीधे सरकार से? सोचिए, क्या यह संवाद सीधे उस विभाग से या उस अधिकारी से नहीं हो सकता? मुझे लगता है कि अब आपकी हेडिंग बन गई होगी। और एक नहीं, कई हेडिंग्स बन गई होंगी। बनी कि नहीं? चलिए, हम ही कुछ सुझाते हैं। भ्रष्टाचार की कलई खोलती इस तस्वीर के कई साफ्ट शीर्षक हो सकते हैं - मनरेगा में यह क्या हो रहा है सर..., मत बेचिए भूखों का अनाज, आ गया भादो अब क्या करेंगे जॉब कार्ड आदि आदि...।

ग्लैमर की चकाचौंध भरे आज के परिवेश में कहीं कोई भूख से मर जाता है। आपको इसकी खबर बनानी है। बहुत आक्रोश होगा मन में। व्यवस्था के प्रति, समाज के प्रति। क्या लिख दें। मन कर रहा होगा कि गुस्से का कोई आखिरी शब्द हो तो उसे ही उकेर दें। पर सावधान, यह हार्ड खबर बिल्कुल साफ्ट हेडिंग की मांग कर रही है। सोचिए, यदि इसकी हेडिंग आप यह लगा दें  'उफ वो ठंडा चूल्हा, वो चमकते बर्तन' तो क्या कम मारक दिखेगी, क्या कम व्यवस्था को झकझोरेगी, क्या इससे निकलने वाला दर्द कुछ ही लोगों को टीसेगा? सोचिए, सोचिए।

और मतलब समझे? कैसे बनती है हार्ड खबर की साफ्ट हेडिंग? पहली बात, आपको खबर से पूरी तरह जुड़ जाना होगा, उस पूरी घटना को अपने ऊपर हुआ मानना होगा। दूसरी बात, अपनी जुबान को किसी भी कुव्यवस्था या भ्रष्टाचार की वजह से पीड़ित की फरियाद लगाने वाले की जुबान बनानी होगी। और सावधानी भी जरूरी है। यह कि मामला प्रखंड की गड़बड़ी का हो तो दोषी पूरे जिला प्रशासन को मत ठहरा दीजिएगा, दोष जिलाधिकारी के मत्थे मत मढ़ दीजिएगा। फिर खबर जिस असर, जिस परिणाम के लिए लिखी जाएगी, उसमें देरी हो जाएगी।  

अब एक सवाल उठ सकता है कि हत्या, लूट और बलात्कार जैसी हार्ड खबर की हेडिंग साफ्ट कैसे की जाए? है न रोचक सवाल? तो जवाब अगली पोस्ट में।

Monday, February 17, 2014

खबरों की जान हैं शीर्षक -1

आइए लेते हैं खबरों की खबर - 5

 बिहार की बात है, मुखियों की गतिविधियों पर कंपाइल स्टोरी बन रही थी। खबर पूरी तरह से नकारात्मक भाव रखने वाली थी। खबर बनकर आई कि लूट-खसोट और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं अधिकतर मुखिया। जिक्र उन योजनाओं का था, जिनकी राशि मुखियों की जेब में पहुंच चुकी थी और असली हकदार लाभ से पूरी तरह वंचित थे। मौका था खबर को पहले पन्ने पर डिस्प्ले का। बात जम नहीं रही थी क्योंकि उसका शीर्षक जम नहीं रहा था। होने लगी ब्रेन स्टार्मिंग। आखिर इस खबर का शीर्षक क्या हो कि पढ़ने वाले के दिलो दिमाग में सीधा घुस जाए। तो बात आई कि आम पब्लिक की मुखियों के बारे में क्या राय है। क्या बोल रही है जनता? जो दो चार वाक्य सामने आए, उनमें एक था - मुखियों की फौज, मार रही मौज। और यह शीर्षक बन गया उस खबर का। यकीन मानिए, अखबार और खबरों की भीड़ में सिर्फ वही शीर्षक चमक रहा था, लोगों को आकर्षित कर रहा था और लोग कह रहे थे, सही लिखा है अखबार ने, हमलोगों की बात रख दी है खोलकर...।

एक दूसरी खबर का जिक्र करूं। लीची का सीजन चल रहा था और पछुआ भी अपनी रफ्तार छोड़ने को तैयार नहीं थी। नतीजा, पेड़ पर टंगी लाल-लाल लीचियां फट गई थीं और इसी के साथ फट गया था लीची किसानों का कलेजा। खबर बन कर तैयार थी। मगर, फिर हालात वही थे। पहले पन्ने पर ली जाने वाली इस खबर का शीर्षक जम नहीं रहा था। तो फिर शुरू हुई ब्रेन स्टार्मिंग। क्या हो शीर्षक? मंथन शुरू हुआ और शीर्षक निकलकर आया- पछुआ ने लीची को लूटा। जी हां, कल के अखबार में इस शीर्षक की सर्वत्र सराहना हो रही थी, किसानों, व्यापारियों और आम पाठकों को भा रही थी। टिप्पणी थी - अखबार बिल्कुल मौलिक लिखता है।

राजस्थान में एक हवाई अड्डे का शिलान्यास करने प्रधानमंत्री आने वाले थे। यह हवाई अड्डा उस खास क्षेत्र में बन रहा था, जहां के लोगों के लिए हवाई जहाज पर चढ़ना तो दूर, उसे नजदीक से देखना भी एक सपने की तरह ही था। जिस दिन हवाई अड्डे का शिलान्यास होना था, उस दिन के अखबार के लिए सिर्फ इसी मुद्दे पर पूरा पेज प्लान था। खबरें तो कई थीं, पर कामन इंट्रो के साथ जो कामन हेडिंग बन रही थी, वह जम नहीं रही थी। जाहिर है विचारों का अंधड़ चल रहा था। प्रतिद्वंद्विता में आगे रहने की होड़ अलग से। आखिर में इसका जो शीर्षक बना, उसकी सराहना दूसरे अखबार वालों ने भी की। शीर्षक था - सपने चूमेंगे आसमान।

शीर्षकों के ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे, जिन पर देर तक, बहुत देर तक बहस की जा सकती है, उदाहरण दिए जा सकते हैं। समझने वाली बात यह है कि खबरों की जान होते हैं शीर्षक और शीर्षक लगाना एक मशक्कत का काम है, दिमाग का काम है, दिल से खबरों से जुड़ने का काम है। अच्छे शीर्षक के लिए कंटेंट का भी अच्छा होना जरूरी है। जैसे, किसी ने खबर बना दी- महेश प्रजापति की अध्यक्षता में प्रज्ञा मंडल की बैठक हुई, इसमें शिक्षा के विकास पर विचार किया गया, इसमें फलां-फलां लोग उपस्थित थे, फलां ने धन्यवाद ज्ञापन की औपचारिकता निभाई। अब इस खबर का क्या लगाएंगे शीर्षक? इस खबर में एक बात मार्के की थी। संवाददाता ने ध्यान दिया होता तो यह छोटी सी खबर भी दिलचस्प हो सकती थी। इसका शीर्षक भी मार्गदर्शन कर सकता था। सोचिए....।

बैठक में क्या हुआ था? जवाब है - शिक्षा के विकास पर विचार। इस छोटी बैठक में लोग भले छोटे रहे हों, उनके विचार महत्वपूर्ण हो सकते थे। आखिर क्या थे शिक्षा के विकास की बाबत उनके विचार। रिपोर्टर को उन पर गौर करना चाहिए था। तब खबर लिखने का एंगल ही बदल जाता, शीर्षक तो अपने आप बदल जाता। बदल जाता कि नहीं? लोगों का आकर्षित करता। करता कि नहीं? जारी....

Saturday, June 22, 2013

...और यूं बदल जाती है खबर

आइए लेते हैं खबरों की खबर - ४

अजीब लग सकता है, पर है दुरुस्त। एक सूचना आई और आपने उसे बिना सोचे समझे खबर में ढाल दिया। खबर गई, छपी, पर कोई असर नहीं छोड़ पाई। आप ही का कोई प्रतिद्वंद्वी उस सूचना की मीन मेख निकालने लगा। कुछ सोचा, कुछ विचारा, कुछ बहस चलाई, क्यों-कैसे का सवाल उठाया और सूचना ने रुख बदल लिया, खबर बदल गई। वह और उसका हाउस छा गया। कैसे? आइए, इसे एक उदाहरण के साथ समझते हैं।

अभी कुछ दिनों पहले की बात है। शाम की बैठक में खबरों की प्रायरिटी तय हो रही थी। इनपुट हेड ने बताया कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से एक महत्वपूर्ण खबर है। पूछा गया - क्या? उन्होंने बताया - बीएचयू प्रशासन ने रैगिंग रोकने के लिए नई नीति बनाई है। पूछा गया - क्या? बताया गया - रैगिंग साबित होने पर इसमें लिप्त लड़के पर कड़ी कार्रवाई तो की ही जाएगी, यदि आरोप गलत निकला तो शिकायत करने वाले पर भी बीएचयू कार्रवाई करेगा। पूछा गया - क्या करेगा? उन्होंने बताया - उसे विश्वविद्यालय से निकाला भी जा सकता है।

सूचना जिस रूप में आई, उसके मुताबिक खबर का स्वरूप था - रैगिंग रोकने के लिए बीएचयू ने बनाई नई नीति। अब नीतियों में क्या-क्या है, इसे दूसरे शीर्षक, प्वाइंटर और बाडी में दीजिए। यह सीधी बात थी, सीधी सूचना थी, सीधा प्रयास था, सीधी खबर बनती, छपती और छपकर खत्म हो जाती। जी हां, खबर खत्म हो जाती। मगर नहीं। सोचने वाले ने सोचा, विचारा, बहस की और खबर बदल गई, उसकी आत्मा बदल गई और खबर कनेक्ट हो गई पूरे छात्र समूह और बीएचयू प्रशासन से। कैसे? आइए, आगे समझते हैं।

प्राथमिक सूचना के साथ जो बहस चली, उसका पहला सवाल था - ये क्या नीति है भई? रैगिंग होने वाला छात्र आखिर कैसे अपने आरोप को साबित करेगा? रैगिंग करने वालों का हुजूम होता है, इसीलिए तो वे भारी पड़ जाते हैं और मनमानी कर पाते हैं। अब एक लड़के की कुछ लड़के अकेले में घेर कर रैगिंग करते हैं तो वह इसे साबित कैसे करेगा, मुश्किल होगी। उसके पक्ष में बोलेगा कौन? यदि बोलने वाला बोलने की स्थिति में होता तो फिर रैगिंग की नौबत ही क्यों आती?

बहस का दूसरा जो बिंदु था, वह यह कि इससे रैगिंग पर रोक लगे न लगे, शिकायतें बंद जरूर हो जाएंगी। लड़के निष्कासन या कार्रवाई के भय से शिकायत ही नहीं करेंगे। तीसरी बात यह उभर कर सामने आई कि बीएचयू प्रशासन ने रैंगिंग रोकने की कवायद नहीं की है, रैगिंग की शिकायतों को खुद तक पहुंचने से रोकने की बुद्धि भिड़ाई है। खूब बहस चली और आखिर में संपादकीय क्रीमी लेयर ने माना कि यह सही है। अब सवाल था, इस खबर को लिखा कैसे जाए, छापा किस अंदाज में जाए।

बहस का रुख सवालिया था तो खबर भी सवालिया निशान छोड़ती बनाने का फैसला हुआ। फिर तय हुआ कि सूचना के आगे की बात रखती हो खबर। खबर के माध्यम से बीएचयू प्रशासन को कुछ सलाह दी जाए। खबर ऐसी बने कि बीएचयू प्रशासन को लगे कि कुछ गलत फैसला हो रहा है। छात्रों को लगे कि अखबार उनके साथ है। आम पाठक को भी लगे कि यह उनकी आवाज है, जो अखबार ने उठाई।

और बस। बन गई हेडिंग। यह थी - नई रैगिंग नीति से मुश्किल में होंगे पीड़ित छात्र। अब क्या यह बताने की जरूरत है कि खबर कैसी होगी, उसका वाक्य विन्यास क्या होगा? हेडिंग बन गई यानी खबर का खाका तैयार। खबर का खाका ठीक-ठाक खिंच जाए, इसके लिए बेहद जरूरी होता है कि मारक हेडिंग बन जाए। खैर, इस पर बात किसी और पोस्ट में। पर साहब, यकीन मानिए, इस खबर का जोरदार इंपैक्ट हुआ। इस खबर को लेकर पूरे विश्वविद्यालय परिसर में सनसनी रही और रही अखबार की चर्चा। फीडबैक पाकर संपादकीय टीम अगले रोज गदगद थी।

तो खबर थोड़ी बहस मांगती है, थोड़ा विचार और थोड़ा चिंतन-मंथन भी। प्रतिद्वंद्विता का दौर है, आगे निकलने की होड़। सोचना तो पड़ेगा न! आगे बताऊंगा शीर्षकों का तिलस्म। आखिर एक शीर्षक कैसे खबर को खींच ले जाता है, कैसे खबरों के बीच से यूं निकल आता है जैसे पानी के भीतर से हवा भरा गुब्बारा। इंतजार कीजिए।

Sunday, June 2, 2013

सावधान, काफी हुनरमंद होती हैं खबरें

आइए लेते हैं खबरों की खबर - 3

खबरों से जुड़े किसी भी शख्स से यह पूछा जाए कि खबरों के कितने वर्ग होते हैं तो वह सीधे-सीधे कई खबरें गिना डालेगा। अपराध-अपराधी की खबरें, घटना-दुर्घटना की खबरें, साहित्य-संस्कृति-सामाजिक सरोकारों की खबरें, शासन-प्रशासन-विधि व्यवस्था की खबरें, शिक्षा-शिक्षक की खबरें, कारोबार-कारोबारी की खबरें, ट्रैफिक-यातायात-परिवहन की खबरें, यात्रा-पर्यटन की खबरें, संचार-दूरसंचार की खबरें, नेता-राजनीति की खबरें, संस्था-संस्थान की खबरें आदि-आदि....।

सही भी है। मोटे तौर पर खबरें इन्हीं जगहों से निकलती हैं, इन्हीं की होती हैं। मगर क्या कभी आपने सोचा कि इन्हीं खबरों के भीतर कुछ और वर्ग तैयार खड़े होते हैं, जिन पर गौर करना बेहद जरूरी हो जाता है। इन वर्गों पर गौर किए बगैर खबरों में घुसे, खबर लिखनी शुरू कर दी, लिख दी तो गड़बड़ी शुरू हो जाती है। गड़बड़ी यानी डेस्क को, आपके संपादक को और अंततः अखबार को या उस मीडिया माध्यम को जिससे आप जुड़े हुए हैं और जिसे आप खबर दे रहे हैं।

जरा सोचिए। वह कोई एक खबर ही तो होती है जो लीड बन जाती है, वह कोई एक खबर ही तो होती है जो बाटम बन जाती है। कोई खबर पहले पन्ने पर जगह ले लेती है कोई अंदर के पन्ने पर चली जाती है। वह भी खबर ही होती है जिसे टाप में बाक्स ट्रीटमेंट दिया जाता है या कह दिया जाता है कि अंदर के किसी भी पन्ने पर बाक्स लगा लें। ध्यान दें, खबर तो वह भी होती है, जिसे छापने से मना कर दिया जाता है।

खबरों का वर्गीकरण और भी हैं। यह है साइज, लेंथ। अकसर अखबारों में बेहद गंभीर चर्चाएं सिर्फ इस बात पर होती हैं कि इस खबर को लीड लगाओ पर दो कालम ट्रीटमेंट दो, तीन कालम ट्रीटमेंट दो या चार कालम से ज्यादा मत छापो। यह तो बैनर है यार, इस खबर को पूरे आठ (आजकल सात) कालम में तानकर- लहराकर छापो। इस खबर को चार कालम में क्यों लिख दिया, यह तो सिंगल कालम में भी छपने के लायक नहीं है, इस खबर को तो ब्रीफ में निपटा दो, इसमें है क्या। इस खबर को सिंगल में क्यों निपटा दिया, इसे कम से कम तीन कालम में छापने के लायक लिखो। इस खबर को किसने लिखा, क्यों लिखा, कितना पैसा खाकर लिखा आदि-आदि...। 

अब यह सोचिए, खबरों की साइज, लेंथ  और उसके प्लेसमेंट पर विचार किए बगैर आपने खबर लिख दी तो कितनी गड़बड़ होती है! एक खबर पर कितनी देर तक उलझन होगी, बहस होगी, समय बर्बाद होगा, आप डांट खाएंगे और पूरा काम करने के बाद भी निराश घर जाएंगे।

तो खबरों की दुनिया में चैन की सांस लेनी है तो उस हुनर का मास्टर बनकर रहिए जहां अगला आपको सिर्फ खबरों की लेंथ-साइज और प्लेसमेंट को लेकर क्लास लगा देता है। और इसका हुनरमंद बनना बेहद आसान है। कुछ बातें सोचने के लिए तो आपको यही आलेख मजबूर कर रहा होगा, कुछ आगे का कर देगा। इंतजार कीजिए।