Monday, December 31, 2012

आओ हे अधुनातन, रो रहा है कण-कण

मुबारक हो ... फिर आया नया साल ...


नया आकाश हो ... नया विहान ...

नई आकांक्षा ... नया वितान ...

जो बीत गया...
जो छूट गया .....

एक अर्पण, एक तर्पण
ना गुंजन, ना सृजन
रो रहा है कण-कण...

अंधेरा घना, लहू से सना
प्रत्यंचा तना, हंसना मना
रो रहा है कण-कण ...

बच्ची ने सच्ची कर दी
जान की कच्ची कर दी

इज्जत कुर्बान कर के
आन को सान दिया

जाओ हे पुरातन
तुम जल्दी जाओ

आओ हे अधुनातन
तुम जल्दी आओ

रो रहा है कण-कण...

Friday, November 23, 2012

एक राज लौटते हुए

राज है कि पथिक घर आया, ठहरा और एक सर्द अफसाने के साथ भोर के धुएं में जर्द हो गया।

राज है कि रात जो काली थी, डूबी थी अंधेरे की गर्त में, उसकी सुबह हो गई, दमक गई, चमक गई।

राज है कि न उसने कुछ बोला, न पथिक ने, मगर रात भर बातें होती रहीं, सुबह तो दोनों थक गए।

राज है कि जब सांकल बजा था तो कौन चौंका था, कौन उठा था और किसने दरवाजा खोला था।

राज है कि सांकल बजा भी था या नहीं, दरवाजा खुला भी था या नहीं, बाहर कोई था भी या नहीं।

राज है कि एक गर्मी आई थी, टकराई थी और उफ-आह के साथ चिपक गई थी दरवाजे से।

राज है कि होंठ बढ़े, सांसें टकराईं, सूनी दास्तां, खूनी दास्तां, अंधेरे से शुरू, अंधेरे में खत्म।

राज है कि सुबह आई, और भी आएंगी, पर रात लंबी हो गई, न बीती, न बीतेगी, नहीं, नहीं बीतेगी।

राज है कि जाते हुए पथिक को दो जोड़ी आंखें रोक रही थीं, लब खामोशी की चादर ओढ़े थे।

राज है कि एक चेहरा बोल रहा था, पथिक सुन रहा था, कान जर्द थे और हृदय सर्द था।

राज है कि ठिठुरती जिंदगी कैसे कांपती टांगों के साथ भोर के धुएं में रफ्ता-रफ्ता खो गई थी।

राज है कि फिर पथिक कभी क्यों रास्ता नहीं भटका, कैसे बन बैठा वह इतना सावधान।

कैसे, राज है, है न राज?

Monday, November 12, 2012

जरा दीये जलाना...

एक बाती 

ओ साथी    

अंधेरा घना है
जरा दीये जलाना
जरा हाथ बढ़ाना
अंगुलियों के रास्ते
संभलकर
घिसना 
तीलियां
माचिस की
जिन्हें जल जाना है
जिन्हें जल कर भी
दीया जलाना है
एक बाती
ओ साथी
जरा दीये जलाना
जरा हाथ बढ़ाना .......

दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ।

Sunday, November 11, 2012

धन बरसे गगन बरसे

बनारस के सुड़िया में स्थापित यह हैं भगवान धन्वंतरि। 

अहा, बनारस में माता अन्नपूर्णेश्वरी  की यह स्वर्ण प्रतिमा, कितना मनोरम!

धन बरसे
तन बरसे 
 
थोड़ा-थोड़ा बरसे 

मन बरसे


बरसे बरसे
गगन बरसे
 
मगन बरसे
लगन बरसे
 
आग लगे पानी 
में अगन बरसे
 
धनतेरस का दिन है
 
भुवन बरसे
 भुवन बरसे
 भुवन बरसे  ...... 

धनतेरस पर ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ.....

Sunday, October 28, 2012

खबर वह जो खबरदार करे

आइए लेते हैं खबरों की खबर - २

एक लंबा समय बीता। ब्लॉग पर नजर गई। लगा कि जो शुरुआत की थी, वह ठीक थी, प्रेरक थी और जिस पेशे में हूं, उसके सम्मान के लिए थी। गैप आया, गड़बड़ हुई। सो, इसी सिलसिले की रफ्तार के साथ फिर सामने हूं।

तो साहब, बात हो रही थी खबरों की। जब भी आप खबरों की बात करेंगे तो सबसे बड़ा सवाल यही आकर आपके सामने खड़ा हो जाएगा कि आखिर खबर क्या है? कोई कहता है हर सूचना खबर है। कोई कहता है हर सूचना खबर नहीं होती। अंग्रेजीदां समझाते हैं, जो न्यू है वह न्यूज है। लो, फंस गया मामला। उस पर भी तुर्रा यह कि अखबारों की नीतियों के मुताबिक, संपादकों के विचारों के मुताबिक खबर की परिभाषा भी रोज-रोज बदलती रहती हैं।

क्रिमिनल माइंडेड संपादक से पाला पड़ गया तो क्राइम की खबरें, सूचनाएं लहराने लगती हैं। बाकी सब बेकार। साहित्यकार या रसिक मिजाज संपादक मिल गया तो क्राइम की खबरें सबसाइड। ये भी कोई खबर है। साहित्य पर पन्ने निकलने लगेंगे, साहित्यकारों के आलेख बाइलाइन छपने लगेंगे, नृत्य कला की माधुरी किसी भी पन्ने पर रस बिखेरने लगेगी। किसी न्यूट्रल संपादक (किसी गुरु का चेला) के सिरे में हुए तो औऱ भी मुश्किलें हैं। वो करेगा कुछ नहीं, बस हर खबर की परिभाषा बताएगा और आप खबर छाप कर भी बेचैन रहेंगे कि कोई ऐसी चीज तो नहीं छाप दी जो खबर नहीं है। अपना ज्ञान तो भूल ही जाएंगे।

तो सवाल है कि खबर क्या है? आइए, विचार करते हैं। जेनरिक फार्मूला - हर सूचना खबर नहीं होती, जबकि हर खबर में सूचना जरूर होती है। एक खबर में कई सूचनाएं हो सकती हैं। यानी सूचनाओं के संग्रह से उपजा हुआ आइटम ही खबर है। इसे अच्छी तरह समझ लें। हर सूचना खबर होती तो सोशल साइट्स पर नजर फेरिए, गूगल को वाच कीजिए, वहां तो सूचनाओं का अंबार लगा है। क्या वे सभी खबरें हैं? नहीं, खबरें होतीं तो गूगल अखबार होता। तो जहां सूचनाओं के संग्रह का काम समाप्त होता है, वहां से खबरों के निर्माण का काम शुरू होता है। यानी जहां से गूगल का काम खत्म वहां से पत्रकारिता शुरू। कोई कंफ्यूजन, कोई शक?

अब एक औऱ बात। जेनरिक से थोड़ा ऊपर, थोड़ा मैच्योर्ड। खबर वह जो खबरदार करे। जो बीती बातों की जानकारी तो दे ही, आगे पर भी प्रकाश डाले। अब एजुकेशन की एक खबर बना रहे हैं। किसी परीक्षा की कोई तारीख छाप रहे हैं। इस खबर में परीक्षा से जुड़ी सारी संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है। फार्म भरने से लेकर परीक्षा की तैयारियों तक। आजकल के परिप्रेक्ष्य में एक पहलू यह भी देखा जा सकता है कि जो तिथि घोषित की जा रही है, उस तिथि पर परीक्षा का हो पाना संभव है या नहीं? क्या उस दौरान किसी बड़े आंदोलन की कोई पूर्व घोषणा तो नहीं है? कहीं किसी चुनाव की कोई शेड्यूलिंग तो नहीं है? हां, तब यह छोटी सी सूचना बड़ी खबर बन सकती है और बनाने वाले होंगे आप। यह खबर पढ़ने वाले को खबरदार करेगी।

खबरों का एक और मिजाज है। हर खबर किसी न किसी समूह को कनेक्ट करती है। आपकी खबर किस समूह को कनेक्ट करती है, यह देखना आपका काम होगा। कनेक्ट करती है तो खबर है, नहीं करती है तो खबर नहीं है। इस कनेक्शन में आपका मिजाज नब्बे फीसदी रिजेक्शन का होना चाहिए। जब ९० को रिजेक्ट कर १० को सेलेक्ट करने की प्रवृत्ति डालेंगे तो खबर सामने आएगी। क्यों, क्योंकि खबर कई प्रकार में आपके सामने आ सकती हैं, आती हैं। एक अपने मूल रूप में, दूसरे फालोअप के रूप में, तीसरे इंपैक्ट के रूप में, चौथे आपकी प्लानिंग के रूप में (न्यूज बिदिन न्यूज)। एक रूप एक्सक्लूसिव का भी है, एक खोजी भी। एक कार्यक्रम है तो एक डेट वैल्यू आयोजन।

ध्यान रहे, खबरों के गठन में, उसके निर्माण में खबरों को पहचानने का नजरिया बड़ा काम आता है। यानी रिपोर्टर का नजरिया। अखबार की नीतियां और संपादक का नजरिया एक तरफ और रिपोर्टर का नजरिया एक तरफ। क्या मजाल जो स्पॉट पर गया व्यक्ति जिस खबर को पहचान ले और लिख मारे, उसे कोई संपादक पकड़ ले, उसे किसी अखबार का नजरिया पकड़ ले। एक शराबी रात में नशे में घर में गिर गया औऱ बेहोश हो गया। उसकी पत्नी ने मदद के लिए मोहल्ले के कई दरवाजे खटखटाए। मदद नहीं मिलने पर उसने पति को साइकिल पर लादा और अपनी बच्ची की मदद से नर्सिंग होम ले गई। वहां भी किसी ने केयर नहीं किया तो वह दूसरे अस्पताल की ओर दौड़ी। आखिर में उसका पति मर गया औऱ इतनी सी सूचना रिपोर्टर के हाथ लगी।

अब देखिए, रिपोर्टर का नजरिया। उसकी खबर का शार्षक था, शहर की संवादनाएं समाप्त। खबर की बॉडी नारी सशक्तीकरण पर नहीं थी, बल्कि भावनाओं से ओतप्रोत संवेदनाओं को झकझोर रही थी। एक महिला अपने पति को साइकिल पर लादकर रात भर दौड़ती रही और पूरे शहर में एक हाथ मदद को सामने नहीं आया। मोहल्लावासियों से लेकर नर्सिंग होम तक को खंगाल देने वाली खबर थी यह। और विश्वास मानिए, अगले दिन उस महिला की मदद को पूरा शहर दौड़ पड़ा। पति के मरने के बाद बेसहारा हुई इस महिला के लिए खबर कितना बड़ा सहारा बन कर आई, यह कल्पना की जा सकती है।

खबर क्या है और खबर किसे कहते हैं, इस पर अभी और बातें होंगी। फिलहाल इतना ही। हां, इस पोस्ट की आखिरी बात यह कहना चाहूंगा कि अब खबर सिर्फ खबर नहीं होती। इस भूल में पड़े तो बड़ी भूल हो जाएगी। खबर में लिखावट होती है, बुनावट होती है, संभावना होती है, प्रेरणा होती है। और यह सब कुछ है तो वह खबर है।


Saturday, December 31, 2011

कहिए मुबारक हो नया साल

कीजिए स्वागत,
फिर आया नया साल,
कहिए मुबारक हो,

मुबारक हो नया साल।

Monday, July 18, 2011

आइए लेते हैं खबरों की खबर

बहुत दिन हुए। ब्लाग पर कुछ लिखा नहीं। होता है। हर आदमी की जिंदगी में ऐसा होता है। मेरे साथ भी हुआ। चाहकर भी कुछ नहीं लिख पाया। अब जब कुछ लिखने का मन बनाया है तो लगता है कि खबरों की बाबत ही कुछ लिखा जाए। साथियों का भी जोर था। कह रहे थे कि पत्रकारिता में इतने दिन गुजार दिए, कुछ अगली पीढ़ी के लिए भी लिखो। कम से कम उतना तो लिख ही दो, जितना अब तक सीखे हो।

दोस्तों ने भले मजाक किया, पर बात मुझे जंची। सही तो कहा था उन्होंने। मुझे भी लगा कि लिखना चाहिए। आखिर रफ्ता-रफ्ता पत्रकारिता में बिना किसी चाहत, बिना किसी इबादत, बिना किसी शरारत के घुसा एक शख्स कैसे मुकाम तय करता है, उसे हासिल करता है और किस कदर अखबारों की जरूरत बन जाता है, यह है शेयर करने के लायक।

सवाल उठता है शुरू कहां से करूं? सच पूछिए तो पत्रकारिता के बारे में जब कभी लिखने का मन बनाया, दिमाग में आत्मकथा लिखने जैसा परिवेश ही बना और बना उस राजनीति को खींचने का खाका, जो अखबारों के दफ्तरों में जड़ जमा चुकी है। नीचे से ऊपर तक, कर्मचारी से मालिकानों तक। सच, इन सभी का मैं मूक गवाह ही तो हूं। पर, इस पर बात कभी और, किसी और श्रृंखला में। अभी तो सिर्फ होगी ज्ञान और ध्यान की बातें, जिससे न्यूकमर कुछ सीख सकें, साथी कुछ मचल सकें और गुरुजन महसूस कर सकें कि बच्चे ने ठीक सीखा।

खबरों की बात खबर से ही शुरू करते हैं। बड़ी-बड़ी परिभाषाएं, लच्छेदार डायलाग, क्या अमिताभ बोलेंगे, उनसे भी जुदा स्टायल में मैंने देखा है संपादकों, वरिष्ठ पत्रकारों को अपने कनिष्ठों को यह समझाते कि खबर क्या है, किसे कहते हैं खबर, ये कोई खबर है, फालतू, बकवास, कूड़ा। जब-जब सुना, सच कहता हूं, कन्फ्यूज ही हुआ। निश्चित रूप से खबर क्या है, परिभाषा के रूप में हम चाहें जो गढ़ लें, जो समझ लें, जो समझा लें, जो छाप लें, पर सच तो यह है कि अखबारों के बदलते, संपादकों के बदलते खबरों की परिभाषा भी बदल जाती है, पैमाना भी बदल जाता है।

शुरुआत में बताया गया कुत्ता काट ले तो खबर नहीं, पर अब कुत्तों के काटने की खबरें बड़े-बड़े अखबार में चार-चार कालम में छपा देख रहा हूं। उस पर से तुर्रा यह कि खबर होती है कुत्तों से बचने के उपायों के साथ, उसके काटने के बाद तीमारगी के वजूहातों के साथ। तो साहब, इस फेरे में न रहें कि कुत्ते काट लें तो खबर नहीं है। वह भी खबर है। देखने की बात यह है कि आप उसे प्रस्तुत कैसे करते हैं। कुत्ते के काटने से कितने पाठकों को जोड़ पाते हैं? इस बहाने नगर प्रशासन की किस लापरवाही का पर्दाफाश कर पाते हैं। यदि यह सब कर लिया तो कुत्ते का काटना भी खबर है और बड़ी खबर है।

मुझे लगता है, शुरुआत ठीक-ठाक हो गई है। सिलसिला शुरू हुआ है तो रफ्ता-रफ्ता यह आगे भी अब बढ़ेगा। बस, इंतजार कीजिए शृंखला की अगली पोस्ट का। झोली में प्रसादों का अंबार है। वादा है, वेराइटी मिलेगी। आप जितना ध्यान देंगे, ज्ञान उतना ही बटोरेंगे, इसकी गारंटी है।