Sunday, October 28, 2012

खबर वह जो खबरदार करे

आइए लेते हैं खबरों की खबर - २

एक लंबा समय बीता। ब्लॉग पर नजर गई। लगा कि जो शुरुआत की थी, वह ठीक थी, प्रेरक थी और जिस पेशे में हूं, उसके सम्मान के लिए थी। गैप आया, गड़बड़ हुई। सो, इसी सिलसिले की रफ्तार के साथ फिर सामने हूं।

तो साहब, बात हो रही थी खबरों की। जब भी आप खबरों की बात करेंगे तो सबसे बड़ा सवाल यही आकर आपके सामने खड़ा हो जाएगा कि आखिर खबर क्या है? कोई कहता है हर सूचना खबर है। कोई कहता है हर सूचना खबर नहीं होती। अंग्रेजीदां समझाते हैं, जो न्यू है वह न्यूज है। लो, फंस गया मामला। उस पर भी तुर्रा यह कि अखबारों की नीतियों के मुताबिक, संपादकों के विचारों के मुताबिक खबर की परिभाषा भी रोज-रोज बदलती रहती हैं।

क्रिमिनल माइंडेड संपादक से पाला पड़ गया तो क्राइम की खबरें, सूचनाएं लहराने लगती हैं। बाकी सब बेकार। साहित्यकार या रसिक मिजाज संपादक मिल गया तो क्राइम की खबरें सबसाइड। ये भी कोई खबर है। साहित्य पर पन्ने निकलने लगेंगे, साहित्यकारों के आलेख बाइलाइन छपने लगेंगे, नृत्य कला की माधुरी किसी भी पन्ने पर रस बिखेरने लगेगी। किसी न्यूट्रल संपादक (किसी गुरु का चेला) के सिरे में हुए तो औऱ भी मुश्किलें हैं। वो करेगा कुछ नहीं, बस हर खबर की परिभाषा बताएगा और आप खबर छाप कर भी बेचैन रहेंगे कि कोई ऐसी चीज तो नहीं छाप दी जो खबर नहीं है। अपना ज्ञान तो भूल ही जाएंगे।

तो सवाल है कि खबर क्या है? आइए, विचार करते हैं। जेनरिक फार्मूला - हर सूचना खबर नहीं होती, जबकि हर खबर में सूचना जरूर होती है। एक खबर में कई सूचनाएं हो सकती हैं। यानी सूचनाओं के संग्रह से उपजा हुआ आइटम ही खबर है। इसे अच्छी तरह समझ लें। हर सूचना खबर होती तो सोशल साइट्स पर नजर फेरिए, गूगल को वाच कीजिए, वहां तो सूचनाओं का अंबार लगा है। क्या वे सभी खबरें हैं? नहीं, खबरें होतीं तो गूगल अखबार होता। तो जहां सूचनाओं के संग्रह का काम समाप्त होता है, वहां से खबरों के निर्माण का काम शुरू होता है। यानी जहां से गूगल का काम खत्म वहां से पत्रकारिता शुरू। कोई कंफ्यूजन, कोई शक?

अब एक औऱ बात। जेनरिक से थोड़ा ऊपर, थोड़ा मैच्योर्ड। खबर वह जो खबरदार करे। जो बीती बातों की जानकारी तो दे ही, आगे पर भी प्रकाश डाले। अब एजुकेशन की एक खबर बना रहे हैं। किसी परीक्षा की कोई तारीख छाप रहे हैं। इस खबर में परीक्षा से जुड़ी सारी संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है। फार्म भरने से लेकर परीक्षा की तैयारियों तक। आजकल के परिप्रेक्ष्य में एक पहलू यह भी देखा जा सकता है कि जो तिथि घोषित की जा रही है, उस तिथि पर परीक्षा का हो पाना संभव है या नहीं? क्या उस दौरान किसी बड़े आंदोलन की कोई पूर्व घोषणा तो नहीं है? कहीं किसी चुनाव की कोई शेड्यूलिंग तो नहीं है? हां, तब यह छोटी सी सूचना बड़ी खबर बन सकती है और बनाने वाले होंगे आप। यह खबर पढ़ने वाले को खबरदार करेगी।

खबरों का एक और मिजाज है। हर खबर किसी न किसी समूह को कनेक्ट करती है। आपकी खबर किस समूह को कनेक्ट करती है, यह देखना आपका काम होगा। कनेक्ट करती है तो खबर है, नहीं करती है तो खबर नहीं है। इस कनेक्शन में आपका मिजाज नब्बे फीसदी रिजेक्शन का होना चाहिए। जब ९० को रिजेक्ट कर १० को सेलेक्ट करने की प्रवृत्ति डालेंगे तो खबर सामने आएगी। क्यों, क्योंकि खबर कई प्रकार में आपके सामने आ सकती हैं, आती हैं। एक अपने मूल रूप में, दूसरे फालोअप के रूप में, तीसरे इंपैक्ट के रूप में, चौथे आपकी प्लानिंग के रूप में (न्यूज बिदिन न्यूज)। एक रूप एक्सक्लूसिव का भी है, एक खोजी भी। एक कार्यक्रम है तो एक डेट वैल्यू आयोजन।

ध्यान रहे, खबरों के गठन में, उसके निर्माण में खबरों को पहचानने का नजरिया बड़ा काम आता है। यानी रिपोर्टर का नजरिया। अखबार की नीतियां और संपादक का नजरिया एक तरफ और रिपोर्टर का नजरिया एक तरफ। क्या मजाल जो स्पॉट पर गया व्यक्ति जिस खबर को पहचान ले और लिख मारे, उसे कोई संपादक पकड़ ले, उसे किसी अखबार का नजरिया पकड़ ले। एक शराबी रात में नशे में घर में गिर गया औऱ बेहोश हो गया। उसकी पत्नी ने मदद के लिए मोहल्ले के कई दरवाजे खटखटाए। मदद नहीं मिलने पर उसने पति को साइकिल पर लादा और अपनी बच्ची की मदद से नर्सिंग होम ले गई। वहां भी किसी ने केयर नहीं किया तो वह दूसरे अस्पताल की ओर दौड़ी। आखिर में उसका पति मर गया औऱ इतनी सी सूचना रिपोर्टर के हाथ लगी।

अब देखिए, रिपोर्टर का नजरिया। उसकी खबर का शार्षक था, शहर की संवादनाएं समाप्त। खबर की बॉडी नारी सशक्तीकरण पर नहीं थी, बल्कि भावनाओं से ओतप्रोत संवेदनाओं को झकझोर रही थी। एक महिला अपने पति को साइकिल पर लादकर रात भर दौड़ती रही और पूरे शहर में एक हाथ मदद को सामने नहीं आया। मोहल्लावासियों से लेकर नर्सिंग होम तक को खंगाल देने वाली खबर थी यह। और विश्वास मानिए, अगले दिन उस महिला की मदद को पूरा शहर दौड़ पड़ा। पति के मरने के बाद बेसहारा हुई इस महिला के लिए खबर कितना बड़ा सहारा बन कर आई, यह कल्पना की जा सकती है।

खबर क्या है और खबर किसे कहते हैं, इस पर अभी और बातें होंगी। फिलहाल इतना ही। हां, इस पोस्ट की आखिरी बात यह कहना चाहूंगा कि अब खबर सिर्फ खबर नहीं होती। इस भूल में पड़े तो बड़ी भूल हो जाएगी। खबर में लिखावट होती है, बुनावट होती है, संभावना होती है, प्रेरणा होती है। और यह सब कुछ है तो वह खबर है।


Saturday, December 31, 2011

कहिए मुबारक हो नया साल

कीजिए स्वागत,
फिर आया नया साल,
कहिए मुबारक हो,

मुबारक हो नया साल।

Monday, July 18, 2011

आइए लेते हैं खबरों की खबर

बहुत दिन हुए। ब्लाग पर कुछ लिखा नहीं। होता है। हर आदमी की जिंदगी में ऐसा होता है। मेरे साथ भी हुआ। चाहकर भी कुछ नहीं लिख पाया। अब जब कुछ लिखने का मन बनाया है तो लगता है कि खबरों की बाबत ही कुछ लिखा जाए। साथियों का भी जोर था। कह रहे थे कि पत्रकारिता में इतने दिन गुजार दिए, कुछ अगली पीढ़ी के लिए भी लिखो। कम से कम उतना तो लिख ही दो, जितना अब तक सीखे हो।

दोस्तों ने भले मजाक किया, पर बात मुझे जंची। सही तो कहा था उन्होंने। मुझे भी लगा कि लिखना चाहिए। आखिर रफ्ता-रफ्ता पत्रकारिता में बिना किसी चाहत, बिना किसी इबादत, बिना किसी शरारत के घुसा एक शख्स कैसे मुकाम तय करता है, उसे हासिल करता है और किस कदर अखबारों की जरूरत बन जाता है, यह है शेयर करने के लायक।

सवाल उठता है शुरू कहां से करूं? सच पूछिए तो पत्रकारिता के बारे में जब कभी लिखने का मन बनाया, दिमाग में आत्मकथा लिखने जैसा परिवेश ही बना और बना उस राजनीति को खींचने का खाका, जो अखबारों के दफ्तरों में जड़ जमा चुकी है। नीचे से ऊपर तक, कर्मचारी से मालिकानों तक। सच, इन सभी का मैं मूक गवाह ही तो हूं। पर, इस पर बात कभी और, किसी और श्रृंखला में। अभी तो सिर्फ होगी ज्ञान और ध्यान की बातें, जिससे न्यूकमर कुछ सीख सकें, साथी कुछ मचल सकें और गुरुजन महसूस कर सकें कि बच्चे ने ठीक सीखा।

खबरों की बात खबर से ही शुरू करते हैं। बड़ी-बड़ी परिभाषाएं, लच्छेदार डायलाग, क्या अमिताभ बोलेंगे, उनसे भी जुदा स्टायल में मैंने देखा है संपादकों, वरिष्ठ पत्रकारों को अपने कनिष्ठों को यह समझाते कि खबर क्या है, किसे कहते हैं खबर, ये कोई खबर है, फालतू, बकवास, कूड़ा। जब-जब सुना, सच कहता हूं, कन्फ्यूज ही हुआ। निश्चित रूप से खबर क्या है, परिभाषा के रूप में हम चाहें जो गढ़ लें, जो समझ लें, जो समझा लें, जो छाप लें, पर सच तो यह है कि अखबारों के बदलते, संपादकों के बदलते खबरों की परिभाषा भी बदल जाती है, पैमाना भी बदल जाता है।

शुरुआत में बताया गया कुत्ता काट ले तो खबर नहीं, पर अब कुत्तों के काटने की खबरें बड़े-बड़े अखबार में चार-चार कालम में छपा देख रहा हूं। उस पर से तुर्रा यह कि खबर होती है कुत्तों से बचने के उपायों के साथ, उसके काटने के बाद तीमारगी के वजूहातों के साथ। तो साहब, इस फेरे में न रहें कि कुत्ते काट लें तो खबर नहीं है। वह भी खबर है। देखने की बात यह है कि आप उसे प्रस्तुत कैसे करते हैं। कुत्ते के काटने से कितने पाठकों को जोड़ पाते हैं? इस बहाने नगर प्रशासन की किस लापरवाही का पर्दाफाश कर पाते हैं। यदि यह सब कर लिया तो कुत्ते का काटना भी खबर है और बड़ी खबर है।

मुझे लगता है, शुरुआत ठीक-ठाक हो गई है। सिलसिला शुरू हुआ है तो रफ्ता-रफ्ता यह आगे भी अब बढ़ेगा। बस, इंतजार कीजिए शृंखला की अगली पोस्ट का। झोली में प्रसादों का अंबार है। वादा है, वेराइटी मिलेगी। आप जितना ध्यान देंगे, ज्ञान उतना ही बटोरेंगे, इसकी गारंटी है।

Friday, December 31, 2010

मुबारक हो नया साल

दिन-रात पड़ा है, गढ़ो घड़ा

कुछ तो लिख डालो पाती

नए साल की धमक जरा

धीमे से सुनना साथी।

धरती ने खोला आसमान

धीरे से चलना साथी

नए साल की धमक जरा

धीमे से सुनना साथी।

बहुत कुछ हुआ गुजरे साल
मुबारक हो नया साल।।

Thursday, December 23, 2010

एक शेक्सपीयर 'वे’ और एक 'ये’








एक का चमक रहा घर व गांव, दूसरे का डूब-धंस रहा

एक 'शेक्सपीयर’ थे ब्रिटेन के विलियम शेक्सपीयर। अपनी रचनाओं (नाटकों व कविताओं) के लिए विश्व भर में प्रसिद्धि पाई और अपने देश ब्रिटेन का नाम रोशन किया। और देखिए, देश और देशवासियों ने उन्हें क्या दिया। उनकी यादों को सहेजकर, उन्हें चमका कर और उन्हें दर्शनीय बना कर उन्हें फिर से जिंदा कर दिया। एवन नदी के किनारे स्ट्रैटफोर्ड है वह जगह, जहां स्थित एक घर में शेक्सपीयर जन्मे, खेले-कूदे और जवान हुए। आज उनका घर ही नहीं, पूरा स्ट्रैटफोर्ड अपान एवन नामक छोटा शहर विश्व के नक्शे पर पर्यटन स्थल के रूप में दमक रहा है। लंदन से 110 किलोमीटर दूर इस स्थल तक पहुंचने के लिए ट्रेन व बस सेवाएं दोनों हैं। प्रशंसकों ने तो शेक्सपीयर एक्सप्रेस नाम की भी एक ट्रेन चला दी है।

और एक थे अपने 'शेक्सपीयर’ रामवृक्ष बेनीपुरी। रचनाधर्मिता का मुक्ताकाश, साहित्य के पुरोधा, क्रांति की मशाल। एक नदी (नाम बागमती) के किनारे बसा है इनका भी गांव बेनीपुर। बस व ट्रेन तो छोडि़ए, इस गांव तक पैदल जाने का भी रास्ता नहीं है। दो बांधों के बीच टापू बने इस गांव को गुड़हन के जंगल ने अपनी आगोश में ले रखा है। हर साल आने वाली बाढ़ की गाद से पूरा गांव जमींदोज होता जा रहा है। और इसी गांव में है वह मकान, जहां हमारे 'शेक्सपीयर’ का जन्म हुआ था। यह मकान भी पूरे गांव के साथ रफ्ता-रफ्ता गायब होता जा रहा है। जो रफ्तार है, अगले पांच-सात सालों में तो यह जरूर ही गायब हो जाएगा।

आज अपने 'शेक्सपीयर’ की जयंती है। गांव वालों ने गुड़हन को काट कर रास्ता बना दिया है। घर और सामने लगी बेनीपुरी जी की प्रतिमा की साफ-सफाई भी कर दी है। बेनीपुरी जी के पुत्र महेन्द्र बेनीपुरी हर साल की तरह इस साल भी धूमधाम से जयंती मना रहे हैं। बेनीपुरी चेतना समिति की ओर से एक समारोह का भी आयोजन किया जा रहा है। इसमें प्लानिंग बोर्ड के उप चेयरमैन हरिकिशोर सिंह और स्थानीय विधायक राम सूरत राय शामिल हो रहे हैं। देखना है कि इस बार क्या घोषणाएं होती हैं? क्या फिर वही कि बेनीपुर को चमकाएंगे, यहां आकर गांव वालों के साथ पूरी रात बिताएंगे? विस्थापित होने को तैयार बेनीपुर गांव में रह रहे बेनीपुरी जी के परिजनों की मांग है, पुनर्वासन और मुआवजा। देखना है कि इस बार क्या यह उन्हें मिल पाता है?

Wednesday, December 22, 2010

कह रहा बेनीपुर, सबको राम-राम-राम


जिनके दिल में पूरे हिन्दुस्तान का दर्द बसा था, जिनका जीवन अंधकार के खिलाफ रोशनी की तलाश और बेचैनी में बीता, उनका गांव बेनीपुर पूरी दुनिया से विदा ले रहा है और सबको राम-राम-राम कह रहा है। कोई काम न आया और फिर आया 23 दिसंबर। आंदोलन के पर्याय, चिरविद्रोही, बिहार में समाजवाद के प्रथम प्रकल्पक, किसान आंदोलन के अग्रणी, निर्भीक पत्रकार व साहित्य के आकाश रामवृक्ष बेनीपुरी की जयंती मनाने का दिन। निश्चित रूप से इस रोज बेनीपुरी जी का देशभर में गुणगान किया जाएगा, पर वह धरती, जहां उन्होंने जन्म लिया, खेले, जवान हुए, आज 'बाय-बाय’ कर रही है।

जी हां, हर साल बागमती नदी का कहर झेलता, उत्तरी-दक्षिणी तटबंधों के बीच बसा और गुड़हन से ढंका यह गांव पांच वर्षों में 12 से 14 फुट जमीन के अंदर समा चुका है। कभी बिजली के लिए यहां लगा पोल खूंटे की तरह दिखता है। जिस मकान में बेनीपुरी जी का जन्म हुआ, उसी के सामने 1987 में लगाई गई थी उनकी प्रतिमा। इस पर उचक कर माला चढ़ाई जाती थी, आज वह एक साधारण आदमी के कद से भी नीचे हो गई है।

मुजफ्फरपुर से सीतामढ़ी के रास्ते में जनाढ़ से दाएं फूटता है बेनीपुर का रास्ता। मगर, पूरे सफर में कहीं कोई निशान नहीं मिलेगा, जिससे लगे कि आप राष्ट्र की धरोहर की ओर बढ़ रहे हैं। जनाढ़ से मुड़ते ही एक किलोमीटर पर मिलेगा मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी रेल लाइन के लिए बागमती पर बनता पुल। इसके नीचे से नदी पार करिए। मिलेगी पगडंडी, गुड़हन से ढंकी। रास्ता बताने वाला न हो तो भटक जाएंगे। बालू में धंसते पांवों के साथ चलिए करीब डेढ़ किलोमीटर, फिर आएगा बेनीपुर। कृषि कार्यों से दूर, गरीबी से कराहता, भूख और बीमारी से जूझता गांव।

लोग विस्थापितों की श्रेणी में हैं। करीब तीन किलोमीटर दूर बागमती बांध के पार एक दूसरा बेनीपुर बसाने की घोषणा हो चुकी है। पर, लोग वहां जाएं कैसे? पुनर्वास और मुआवजा की टकटकी है। इसी साल 30 जनवरी को गांव में ही प्रमंडलीय आयुक्त ने घोषणा की थी कि जून तक सभी को पुनर्वासित किया जाएगा, पर दिसंबर आ गया। लोग तैयार हैं, बस उचित फैसले का इंतजार है। इस गांव की एक सबसे बड़ी मांग यह है कि न घर रहा न खेती, सरकार कम से कम सभी को अंत्योदय योजना से जोड़ दे, ताकि दो जून रोटी का जुगाड़ हो जाए, ताकि भूखों मरना न पड़े।



एक शायर का कलाम - कल तक जिसके वजूद पर तूने कई खत लिखे थे उम्मीद के, अभी हाल की बात है, वो दरख्त प्यार का जल गया।

Wednesday, August 18, 2010

साहित्याकाश का प्रचंड धूमकेतु आज अकेला




15 अगस्त 2010 की शाम करीब साढ़े पांच बजे का समय। स्थान मुजफ्फरपुर स्थित निराला निकेतन। साहित्याकाश के प्रचंड धूमकेतु जानकी वल्लभ शास्त्री का आवास। बरामदे पर पलंग पर पालथी मारे विराजमान हैं नब्बे से भी ऊपर के हो चुके सरस्वती के परम उपासक। खुशमिजाज, चेहरे पर मुस्कुराहट। करीब डेढ़ घंटे का सानिध्य और सारी आशंकाएं निर्मूल कि बीमार हैं, कि कमजोर हैं, कि आगंतुकों पर आवारा कुत्तों को दौड़ा देते हैं। बरामदे के सामने पिता का मंदिर और मंदिर के आगे सीमेंट से बनी नादों में चारा-सानी खातीं गायें।

शुरुआत होती है कैसे हैं, तबीयत कैसी है? और शुरू हो जाते हैं। देख ही रहे हैं, ठीक हूं। ऊपर टंगे एक चित्र को दिखाते हुए कहते हैं कि यह लड़का आया था मुजफ्फरपुर। उसके सामने दूसरी दीवार पर टंगे दूसरे चित्र को दिखाते कहते हैं कि यह लड़का पटना से सेवानिवृत हुआ था। जब लोग नौकरी खोजने जाते हैं और जैसा दिखते हैं, तब यह सेवानिवृत होने के वक्त दिखता था। इन दोनों के बीच आपके सामने बैठा है युवक जानकी वल्लभ शास्त्री। अकेला। एक एकड़ जमीन के प्लाट में बने आवास में अकेला। उम्र का कहीं कोई प्रभाव न वाणी पर था न नजरों पर। ध्यान भटकते इधर देखिए के साथ बातें कर रहे थे।

अकेला? एक छोटा सा सवाल और जैसे चिनगारी फूटी - हां अकेला। फिर लंबी चुप्पी.. मानो इस 'अकेला' में बड़ा रहस्य छिपा था। चेहरे पर सौम्यता बरकरार थी। बोलने लगे, मुजफ्फरपुर में बड़े-बड़े बुद्धिमान हैं। ऐसे बुद्धिमान, जिनके आगे मूर्खता शर्म से सिर छिपा लेती है। थोड़ा विराम और 'एक किरण सौ झाइयां', 'तीर तरंग', 'अवंतिका', 'मेघगीत', 'अष्टपदी' जैसी दर्जनों पुस्तकों के रचयिता मानो फ्लैशबैक में चले जाते हैं। बोलते हैं, मैंने की है ईश्वर से बातचीत। ईश्वर के सामने कोई बुद्धिमानी काम नहीं आती। ईश्वर समर्पण खोजता है। सहजता खोजता है। सहजता और समर्पण के साथ जो अपने उद्देश्यों को पूरा करने में लगा है, ईश्वर हमेशा उसके साथ होते हैं। मुझे देखिए। पांच वर्ष का था। मैगरा (यहीं के हैं मूल निवासी) में घर के आंगन में मंदिर के सामने पूजा कर रहा था। मां बोली, क्या कर रहे हो? मैंने कहा, भगवान शंकर मुझे बनारस बुला रहे हैं। अगले दिन ही मां चल बसी। उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ कि बेटा बनारस चला जाएगा। बनारस गया। पढ़ाई की। रायगढ़ के राजा प्रभावित थे। उन्होंने राजकवि का सम्मान दिया। एक दिन गंगा पार कर पटना से मुजफ्फरपुर आ गया। यहीं वैकेंसी आई और बन गए प्रोफेसर। पटना से सेवानिवृत होकर फिर मुजफ्फरपुर आ गया। कहते हैं, मैंने कुछ नहीं किया, ईश्वर की मर्जी थी और मैं उसके आदेशों को मानता जा रहा था।

इसी बीच नाश्ता-चाय के लिए पूछते हैं। मना करने पर बोलते हैं कि क्या नाराजगी में? नहीं बाबा के जवाब पर चेहरे पर संतुष्टि खिल जाती है। फिर बोलते हैं, पिताजी आए थे। रात में दूध दिया गया खाने को। पूछा कैसा दूध है? खरीदकर मंगाया गया है बताने पर उन्होंने कहा कि मैं तो खरीदकर दूध खाने का पक्षधर नहीं हूं। बस क्या था, अगले रोज मैंने दरवाजे पर गाय बांध दी। आज उसी एक गाय की नस्लें चल रही हैं। निराला निकेतन में जो गायें मरतीं हैं, उन्हें यहीं समाधिस्थ कर दिया जाता है। सब अकेले कर रहा हूं। ईश्वर की मर्जी। कहते हैं, मैंने जीवन भर सरस्वती की साधना की है। इसके अलावा दूसरा कोई काम ही नहीं किया। पैर नाकाम हो गए हैं, पर लेखन बंद नहीं हुआ। आज भी बेला पत्रिका निकालता हूं। अभी एक पुस्तक आई है - राधा। सात खंडों के इस एकाकार महाकाव्य का मूल्य एक हजार रुपये है। लिखने से कुछ आमद होती है, समय भी गुजरता है। मोहल्ले भर के आवारा कुत्ते यहां आते हैं। उन्हें दूध रोटी देता हूं। कहां से चलता है सब? ईश्वर की सत्ता है और मेरा समर्पण।

डेढ़ घंटे के वार्ताक्रम में साहित्य के जीवित वयोवृद्ध हस्ताक्षर की जो चिंता सामने आई, वह यह थी कि धर्मपत्नी छाया देवी पिछले कई दिनों से बीमार चल रही हैं। इलाज होता है, पर बीमार रह रही हैं। चेहरे पर एक पल के लिए साफ झलका वह अनुकूलन कि अकेला शख्स.., पर थोड़ी देर बाद ही छाया था संतोष कि ईश्वर की सत्ता.., फिर समर्पण भी कि जो वह चाहता है अच्छा ही चाहता है.., सांसारिक अनुभव भी कि भला या बुरा कुछ भी आपके साथ हो रहा है, उस पर आपकी क्या मर्जी.. और आखिर में एक सवाल भी कि कुछ है मर्जी..? 15 अगस्त की शाम इस मुलाकात में कवि की आखिरी वाणी थी- जब इच्छा हो नि:संकोच आइएगा।

अरुण शर्मा एडवोकेट का एक एसएमएस - दुनिया में देखने के चार नजरिए। पीछे झांकने से अनुभव दिखता है। आगे झांकने से आशा। अगल-बगल झांकने से आप वास्तविकता देख सकते हैं, जबकि अपने अंदर झांकने से देख सकते हैं आत्मविश्वास।